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प्लेटोनिक लव – Platonic Love Story Hindi By साधना जैन

( प्लेटोनिक लव – Platonic Love Story in Hindi ) 

वय: संधि के उस मोड़ पर खड़ी थी , जब मन का पंछी बाते करता था अपने आप से | संभालना मुश्किल होता ना
अपने आप को | तुम कब कैसे बिना आहट किए आए और चले गए ,कुछ पता ही नहीं चला | जिन मुंडेरों पर आज तक धुप खेलती थी थककर चली जाती थी ,उन मुंडेरों पर अब धुप के साथ मै खेलने लगी थी | इंग्लिश क्लास में जब तुम्हारी गगनचुम्बी दृस्टि मुझ पर आकर ठहरती थी तो सिमट जाती थी निनी अपने आपमें मैं तो एक रिज़र्व नेचर वाली लड़की के नाम से जानी जाती थी  पर तुम  तो वहा हर दिल के राजा थे |   वार्षिक कार्यक्रम से लेकर छोटे  से छोटा कार्य तुम्हारे बिना याद नहीं कभी संपन्न हुआ हो | मुझे तो तुम शुरू से अच्छे  लगे थे  इंग्लिश की क्लास में कितना सुनती कितना ग्रहण करती पता था अपनी किताबो में सर गड़ाये  सदा चोरी छिपे तुम्हे देखती रहती और मेरी यह चोरी जब तुम पकड़ लेते तो हल्की सी नाराजगी के साथ मुस्करा देते थे | ऐसे ही जाने कब क्लास  में  चोरी -छिपे देखने वाले हम अब एक -दूसरे को देखकर स्मित सी मुस्कराहट फेंककर अलग हो  जाते थे | मुझे याद है तुमसे बाते करने के लिए में न जाने कितनी रिहर्सल करती कॉलेज आती थी  और तुम्हे देखकर सब भूल जाती थी | अपने आप में ही शर्माने लगी थी में | धीरे -धीरे ग्रुप में खड़े ,केंटीन में बैठे हर वक्त ऐसा लगता जैसे कोई दो आँखे मेरी देह से चिपकी है तुम्हारी आँखे सदा मेरा पीछा करने लगी थी | तुम पर बड़ी झंझलाहट होती ,हमें देखकर मुस्कराते हो  तो  बाते क्यों नहीं करते हमसे ? तुम कभी क्लास में भी हमसे प्रश्न नहीं पूछते ,तुम तो प्रोफ़ेसर थे , किसी भी बहाने से बोल सकते थे , मैं तो सहमी सहमी रहती थी ,चोरी -चोरी देखा करती थी तुम्हे | शायद मेरे मन लेकर कितने ही सपने बना था मन , सोचा था उम्र का बंधन कोई बंधन तो नहीं,समाज ,प्यार ,पैसा ,कुछ भी तो ऐसा जिस लकीर को मैं पार न कर सकूं  पर शायद तुम तो बेखबर थे मेरे प्रति | मुझे याद है वह  दिन जब तुमने मुझे पुकारा था |
चार दिनों तक बीमार रहने से मैं कॉलेज न जा सकी थी हॉस्टल की वह खाली सफ़ेद दीवारे ,बुखार की पीड़ा में तुम्हारी याद , पागल हो गयी थी मैं  |  हर वक्त जैसे लगता था तुम मुस्कुरा रहे हो , मेरा इंजतार कर रहे हो |  और जब ठीक होने पर कॉलेज पहुंची ,सारा दिन क्लास में तुमने एक बार भी मेरी ओर  न  देखा ,गुस्से से आग लग गई थी | उँह मुझे क्या पड़ी  है अब कभी भी न सोचूंगी तुम्हारे बारे में |
शाम को लाइब्रेरी में निरथर्क पन्ने टटोलती जब तुम्हे लाइब्रेरी में आते देखा तो बस देखती रही टकटकी बांधे , पर अचानक सारा गुस्सा एकसाथ उमड़ आया | किताब को बेदर्दी से बंद कर खड़ी हो गयी  और दरवाजे  की और बढ़ने लगी | तुम बहुत ही प्यारे अंदाज में बोले “मिनी तुम कह रही थी की शेक्सपियर की कुछ लाइने समझनी है आओ चलो समझा दे “
तुम्हारी गंभीर आवाज गूंज उठी थी ,मैं सहम सी गई थी  लगा मन को काबू न रख संकूगी जोर -जोर  से चिल्ला उठूंगी पर फिर तुम्हारे चुंबकीय आकर्षण में जकड़ी मैं तुम्हारे सामने बैठ गयी , सोचने लगी तुमने कभी हमें नाम से कहां पुकारा था अटेंडेंस लेते समय नम्बर 14 ऐसे ही गुजर जाता था |
मिनी जी आओ बाहर लॉन में  चलो , वही समझा देंगे | तुम बाहर चले आए थे  पीछे -पीछे मैं भी | जाने क्यों जितना कण्ट्रोल किए थी अपने आपको फूट पड़ी बाहर आकर | तुम्हे  क्या  लेना -देना कोई मर भी जाए

युवावस्था में जाने -अजनाने मन किसी ओर खिंचता चला जाता है बगैर यह सोचे की अंजाम क्या होगा | अपने
आदर्श व्यक्ति के प्रति आकर्षण उम्र के इस दौर की स्वभाविक प्रक्रिया होती है , जब कटु सच्चाई पता चलती है
तो कई नकारात्मक विचार मन में उठने लगते है मगर बाद में उम्र के किसी कोने पर अगर यही प्रेम दयनीय -निस्सहाय हालत में मिल जाए तो ? क्या उसे झुटलाना आसान होता है ? 

तुम्हारी खातिर , में भी बस पागल हूँ और जाने क्या क्या मैं तो भूल गई थी की तुम वही ही  हो ,जिनसे कभी हमारी बातचीत तक न थी  और उस दिन फिर तुमसे प्यार से कितना समझाया था | कॉलेज टाइम खत्म हो चूका था पर जैसे मैं तो सब कुछ भूल गई थी हरी हरी दुब पर बैठकर तुमने इस एकतरफा प्यार को खत्म करने के लिए कितना समझाया था मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर उस स्पर्श का एहसास लिए मैं जाने कितने सालो की ज़िंदगी जी बैठी थी कुछ ही पलो में |
तुम अब बाहर भी मिलने लगे थे | कॉलेज के बाद अक्सर केंटीन के पीछे वाले पार्क में रास्ते में इधर -उधर मुस्कुराहटो का नजराना पेश कर देते और में इस इंतजार में अपने को पागल बनाए बैठी थी की तुम कभी कहोगे | मिनी हमें तुमसे प्यार है, शादी करोगी ? पर तुमने कभी संबोधन नहीं दिया ,कोई नाम नहीं इस रिश्ते का , तुम्हारे साथ दो -दो घंटे बिताए थे रेस्तरां में ,लॉन पर फैली दुब पर पेड़ो के लम्बे लम्बे सायों के बीच बातो का कोई और छोर नहीं दीखता था , तुम बाते करते जाने कौन -कौन से टॉपिक पर न जाने क्या -क्या और मैं पगली देखती रहती थी तुम्हे | सोचती थी क्या तुम वही हो कॉलेज के प्रोफेसर ,छोटी सी उम्र में छा जाने वाले लेखक , लड़कियों से घिरे निराले व्यक्तित्व के स्वामी गुंजन शर्मा या सिर्फ मेरे गूंज |
कहने को तो हम दोनों के बीच गुरु -शिष्या  का रिश्ता था पर मन ने कभी स्वीकारा  नहीं | शुरू से ही मैं तुम्हारे निराले व्यक्तित्व के या कहो तुम्हारे लिखे नॉवेल के या तुम्हारी शैली क्या बताऊ किस बात के आकर्षण में बंधी थी | मुझे कभी – कभी लगता मेरा तुम्हारी ओर ये बहाव कभी एकतरफा तो नहीं पर तुम्हारी आँखों  में चाहत के भाव मैंने अच्छी तरह पढ़े थे | फिर तुम्हारे साथ मेरा यूँ वक्त गुजारना | आमलोगो की तरह हमने कभी “आई लव यू ” नहीं कहा पर जाने क्यों कही न कही मेरे मन की राहे तुम्हारे मन से मिल चुकी थी | बहुत बार सोचा खुद ही पहल कर पूछ लूँ तुमसे पर शर्मो हया की दीवार के भीतर एक ही प्रश्न कौंधता था कही तुम्हे खो तो न दूंगी ?
धीरे -धीरे लोगो की जुबान से फिसलकर हमारा -तुम्हारा नाम अब कॉलेज की दीवारे रंगने लगा था ,कितनी अफवाहे थी | तुम्हारा मेरी ओर देखना भर भी सबकी जुबान पर नए किस्सों को जन्म दे देता था | मुझे याद है तुम यदि फूल के  किसी हिस्से को चुंबते भर भी तो सारे एहसास डाल देते थे | मेरी झोली में  तुम्हारा  बार -बार उन मुँडेरो पर दस्तक देकर कागज  रखना , जिस पर कुछ नहीं सब यूं ही लिखा होता था | मिनी सो रही हो क्या ,अरे बाबा क्लास है ये आपके सपनो की दुनिया नहीं , वगैरह वगैरह मुझे रोमांचित कर जाता |
तुमने मेरा साथ पाकर क्या पाया मुझे गुमान नहीं मगर मैं क्या से क्या बन गई | तुम  हंसोगे तुम्हारी मिनी कविता भी लिखने लगी थी |  लोगो ने  हमारे बीच के रिश्ते को न जाने कितने नाम दिए , कुछ भद्दे कुछ अश्लील पर एक तुम ही थे जो बिना कुछ कहे सुने उसी तरह मिलते थे जैसे पहले दिन मिले थे |
धीरे -धीरे मेरे घर पर हमारे बीच संबंध चिंता का विषय बनने लगे थे | दीवारों पर रेंगते और  लोगो के होंटो  पर तैरते तुम्हारे -हमारे अफ़सानो को सुनकर पापा भी चिंतित  हो चले थे | मेरे लिए पापा  द्वारा लाए हर रिश्ते को लौटाती मै अपनी चाहत के अंजाम को  लेकर चिंतित हो गई  थी |
सोचा एक दिन तुमसे साथ बैठकर बात ही कर लूं पर दिल ही दिल में न जाने किन एहसासो को चिपकाए फिरती रही बेखबर सी , जानते हो गूंज माँ कहती थी की तुम जिससे प्यार करती हो वह भी तुम्हारे लिए दिल में कोई नाजुक एहसास लेकर घूमता होगा – हर बात का इजहार जरुरी तो नहीं |
मिनी गूंज तुम्हारा -हमारा  ये नाम किसी को रास नहीं आया | कुछ गुमान नहीं कब दिन खिसकते रहे और ३१ दिसम्बर आ गया , हाँ उसी दिन तुम कॉलेज से विदा किए जा रहे थे फेयरवेल था ,सुना था तुमने कोई और कॉलेज ज्वाइन कर लिया था | जिन आँखों में मैंने कभी गुलाब की पुरनमता का एहसास किया था ,उन्हों आँखों में अजनबियों  से मुझसे बिलकुल बिखरे रंग ने मेरे दिल को रुसवा किया था | मुझे लगा की इस तरह बदलाव  से तुमने शायद हालात से समझौता कर लिया |
31 दिसम्बर तुम्हारा फेयरवेल , अभी तक याद है मुझे | तुम पर जोर शोर से बोला जा रहा था | एकांत के दो क्षण भी न पा सकी | इतनी भागदौड़ के बाद बस चुपके से स्लिप रखकर आ गई थी |  मैंने देखा ओसो से सनी तुम्हारी आँखे आर्द्र नम पलके मेरी आखिरी स्लिप थी | गुंज लोगो ने बहुत नाम दिए हमारे रिश्ते को , कोई  नाम तुम भी दे दो न |
तुम्हारा शहर से विदा होना शायद मुझसे देखा न गया ,आँखे तुम्हारा इंतजार कर थक सी गई थी | मैं भी चाहती थी तुमसे पूछ लूँ क्यों छोड़ रहे हो मुझे यूँ इस तरह ? मन चीख रहा था तुमने मुझसे प्यार का कोई वादा नहीं किया ,साथ रहने की कसमे नहीं खाई पर इसका अर्थ यह नहीं की साथ चलते चलते अचानक अपनी राह ही बदल लो | बिना कुछ बोले पर तुम्हारे रुख में आया अचानक परिवर्तन मुझे देखकर |
मैंने तुम्हे मैसेज  भी दिया था ७ : ३०  हो चुके थे ,अनेक शंकाओ से घिरी मैं सहमी सी ट्रेन में बैठी थी ,मन जाने क्यों कह रहा था तुम आओगे जरूर आओगे , हर आहट पर हर यात्री के चेहरे में टटोलती तुम्हे बार -बार खड़ी देख रही थी ,आशा -निराशा में बदलने लगी थी फिर ट्रेन की सीटी बजी मैंने जाने क्यों आँखे बंद कर ली पर खोली तो पाया तुम वही खड़े थे एक गुलदस्ता लिए एक स्लिप फंसी थी उसमे |
कुछ नहीं बोले तुम ,लगता था जैसे यहां आकर शब्द निरर्थक हो गए थे और अर्थो ने परिभाषा खो दी थी , बस आँखे ही थी जो वही जा रही थी | तुमने मेरा हाथ पकड़ लिया कसकर , उस पल को मैंने कितनी खूबसूरती  से जिया तुम्हे एहसास न होगा |
फिर तुम उतर गए ,ट्रेन चल पड़ी थी ,दो हाथ हिलते रहे थे जाने कितनी देर तक ,जाने कितनी दूर तक ,मेरी आंखे अभी भी वही जगह खोज रही थी ,जहाँ तुम खड़े थे |
गुंज सोचती हूँ आज भी तुम सबसे अलग थे | क्या तुम्हारी जगह कोई ले सकता  है कभी ? मन कहता नहीं | अपने पुरे साल की संचित निधि को संभाले बैठी ,तुम्हारा वह अंतिम गुलदस्ता ,उसकी महक ,उससे लिपटा पत्र ,आज भी लहू में पीड़ा बन खुरच रहे थे मेरी आत्मा को तुम्हारे वे शब्द -निकी ,किसी चीज में यथार्थ ही उसका अस्तित्व होता है ,एक नॉवेल लिख रहा था ,तुम्हे देखा तो उसकी नायिका हूबहू तुममे नजर आई ,महसूस करना  चाहता ऐसे ऐसे प्लेटोनिक लव की उष्णता को ,सच का धरातल देना चाहता था अपने साहित्य को ,तुम्हे मोहरा बना बैठा , माफ़ करना मेरी एक प्यारी बच्ची और बीवी है जिनसे अलग मैं स्वयं कुछ नहीं | उस समय को एक एहसास समझ झटक देना अपने पल्लू से और अपनी जिंदगी को नया आयाम देना ,वही सच है | तुम्हरे सर ..| ,
उस वक्त कुछ पलो के लिए सांसो की गति कुंद हो गई  ,मेरे गुंज आज से मेरे  सर | बार -बार प्र्शन उठता क्या मेरे एहसास ,बचपना ,बदनामी ,गुंज के लिए साधन मात्र व् अपनी रचना में रंग भरने के लिए ,मेरा पहला प्यार कुछ पन्ने बनकर रह गया एक निर्जीव नॉवेल के |
लम्हा -लम्हा जुड़कर दिन बनते है ,पर यदि ये लम्हे दुःख, पीड़ा ,बदनामी के हो तो जीना मुशिकल हो जाता है ,मुझे जिंदगी में वापस लौटने में ,तुम्हे अपनी ओर बुलाने के लिए वह हाथ की काटी नाड़ी , आत्महत्या के प्रयास ,सब भूल रही थी मैं , यूँ प्यार इस उम्र में सभी करते है ,मंजिल पकड़ लेते है ,किन्तु प्यार में इस तरह बुरी तरह धोखा छली गई मैं , एक निर्जीव किताब के पन्नो में बिखरे चरित्र को जिवंत बनाने में किया प्रयोग |
पर आज पांच साल बाद मुझे महसूस हुआ की कितनी गलत थी मै ? अपने पति यश को पाकर जीवन प्यार समर्पण नारीत्व सभी शब्दों के मायने मिले थे मुझे | कभी -कभी सोचती हूँ यदि मेरी आत्महत्या की धमकी के दबाव में आकर तुम यदि कोई संबंध बना लेते ,मुजरिम बन जाती ,एक अच्छे -भले बसे बसाए घर को तोड़ने के अपराध में | क्यों अंधी हो गयी थी मैं उस वक्त ? क्यों सुलग उठी थी उस एकतरफा  प्यार की आग में ? फिर उम्र का फासला ,सामाजिक मर्यादा ,भगवान और इंसान दोनों मिलकर बनाई इस दुनिया में हर चीज का स्थान तय है , जीवन चक्र भी अपनी नियत गति से अपनी सीमाओं में चलता है – मैं क्यों दखल दे बैठी थी ?
यश जैसा पति और बंटी जैसा प्यारा बेटा ,तुम्हे  शुक्रिया कैसे अदा करूँ गुंज जिंदगी की इस दूसरी  पारी के लिए ?
हॉलीवुड के बड़े डायरेक्टर ने बेहतरीन फोटोग्राफर की तलाश में किसी कंपनी के साथ मिलकर एक प्रतियोगिता आयोजित की थी – बेस्ट सीन्स टच माय लाइफ |
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में विज्ञापन देखा यश तो जैसे पागल हो गए ,कुछ हरदम नया करने की भरपूर ऊर्जा है उनमे ,फिर लक्ष्य मिल गया था | हर वक्त बस कैमरा और प्रकृति ,लोगो के जीवन में ताक झांक | सीन की तलाश में खुद को पूरी तरह झोंक दिया था उन्होंने | ऐसे ही एक दिन दौड़े चले आए ,बेटे को उठाकर नाच उठे ,मुझे देखा तो बिना सोचे -समझे ढेर सारे चुम्बन जड़ दिए |
मिनी ,देखो अब हमें हॉलीवुड जाने से कोई नहीं रोक सकता  ,देखो क्या लाया हूँ चार -पांच  पोस्टकार्ड्स साइज फोटो थमा दिए उन्होंने मेरे हाथ में  | साठ सत्तर साल का एक अस्तव्यस्त ,जीवन से भरपूर बुजुर्ग |
बेह्तरीब बढे बाल ,ढीली पोशाक ,शायद यश के कैमरे ने उसकी आँखों और होंटो को कुछ ज्यादा ही हाई लाइट  किया था | जिंदगी के कई रहस्यों में उलझी वे रहस्य्मय आंखे ,दुखो  के  कई क्षणो को अपने में समेट किसी झुरमुट से स्वाभाविक रूप से निकली होंटो पे फैली मुस्कुराहट , कांपते घुटने ,अशक्त शरीर से हारा पर जीने की भरपूर ऊर्जा से लिपटा वह फोटो |
कुछ ही क्षणों में मुझे जैसे किसी स्टेचयू बना दिया हो जैसे | इन सबसे परे वह तुम थे गुंज ,मेरे वही इंग्लिश के प्रोफेसर ,मेरे एकतरफा प्रेम के नायक |
तुम्हे इस हाल में कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर इस तरह देखने की कभी कोई ख्वहिश नहीं जगी थी मेरे अंदर  बहुत संतुष्ट थी मैं वर्तमान से पर फोटो के रूप में हकीकत बन फिर मेरे सामने तुम खड़े थे |
” हैं ना कुछ निराला अद्भुत ” मेरी हां के इंतजार में उत्साह से दोहरे हुए जा रहे यश की आवाज ने मुझे फिर से सच के धरातल पर ला खड़ा किया |
 मैं लौट आई वर्तमान में अपने भावो को अपने भीतर समेटती -“हाँ यश तुम्हारा सपना ये फोटो जरूर पूरा करेगा ” मैंने उसे एक सबसे अच्छी तस्वीर थमाते कहा |  “ये तो बताओ तुम्हे कहाँ मिले थे ?” मैंने तस्वीर की ओर इशारा करके पूछा |
“अरे जान यूँ ही भटक रहा था ,मुंबई की गलियों में बुजुर्गो का एक आश्रम है अँधेरी में , कई सामाजिक संस्था मिल कर चलाती है ,सोचा -देखता चलूँ यहाँ भी |

नीम के घनेरे पेड़ के निचे उड़ते बिखरते पन्नो के बीच तन्मयता से कलम चलाते इस बुजुर्ग की आँखों ने ऐसा प्रभावित किया की  लगातार कई घंटो तक इसके सारे क्रियाकलापो को कैमरे में कैद करता रहा | कुछ फोटो तो लाजहाब लगे जो तुम्हारे सामने हाजिर कर दिए बन्दे ने – यश की ख़ुशी झलक रही थी उनके शब्दों में |
अच्छा ये सच मुच में ऐसे ही है या इन्हे इतना विशेष बनाने में अपनी कला का इस्तेमाल भी किया जनाब ने | गुंज को एक बार फिर से देखने का मन किया मैं पता जानने की कोशिश करने लगी थी | दूर से देखना ,फिर फैसला करना की ये साहब लाजहाब है या बन्दे में भी। .. कुछ चुहलबाजी पर उतर आए |
वह तुम ही थे प्रोफेसर गुंज | पर इस हाल में ? ऐसी जगह ? कई सवाल मुझे परेशान करने लगे | मैं यश का इधर -उधर होने का इंतजार करने लगी |
पूरा सफ्ताह बीत गया ,किसी पत्रिका के फोटो सेशन के लिए यश खंडाला गए | उनके घर से बाहर निकलते ही बेटे को पड़ोस में छोड़ तुरंत आश्रम की ओर चल पड़ी ,बहुत मुशिकल से तुम तक पहुंची ,कोने के एक कमरे में बुखार से तपते ,बेहोशी  में थे | आंसू निकल पड़े तुम्हारा ये हाल देखकर | आसपास पूछा तो पता चला की तुम्हे भयानक बीमारी एड्स है |
ऐसी बीमारी और इस वीरान आश्रम में ?जहाँ तक तुम्हारे बारे में जानती थी एक भरा पूरा परिवार है ,उस पर पच्चीस -तीस नाटक ,कई नॉवेल प्रकाशित हो चुके है , इतनी प्रसिद्ध हस्ती इस वक्त यहाँ ? कहां गए वे अपने ? वे मेरे जैसे तुम्हारे लेखनी के दीवाने पाठक ? तुम्हारे गढे चरित्रों को अपने जीवन में हूबहू नकल करने वाले लोग ? क्या दुनिया उगते सूरज को ही सलाम करती है ? कलाकार के जीवन की इतनी बड़ी विडम्बना ?
मेरे अनेक प्रश्न जिनका उतर तुम स्वयं ही दे सकते थे , बस ! और कोई नहीं ! पर तुम्हारे कुछ स्वस्थ होने का इंतजार मुझे करना था | कुछ दिनों तक मैं यश से छुप -छुप कर आश्रम आती रही | फल ,दवाइयां ,कपडे लाकर ,तुम्हारे अस्तव्यस्त लिखे पन्नो को व्यवस्थित करने जाने कौन सी संतुष्टि पाता मन ? क्या ये भी प्यार कर कोई रूप था जो ,तुमसे नफरत के बाद भी मेरे अंदर साँस ले रहा था अभी भी ? सारी नाराजगी जैसे हवा हो गई  थी मन से | एक दिन जब मैं आश्रम पंहुची तो तुम काफी बेहतर लग रहे  थे ,बोलने की शक्ति भी तुममे ,बेहोशी से जैसे जगे हो | मुझे देखकर चौंक गये थे ” तुम वही हो जो इस अनाथ बेजान में जान डालने की कोशिश में दिन -रात एक कर रही हो “
गुंज मेरे शब्द गले में ही फंस गए | गुंज ,नहीं मिम्मी ,”सर ” कहो ,तुम्हारे इंग्लिश वाले सर ,  अच्छी शिष्या अपने गुरु को भला  नाम से बुलाती है क्या ? पुरे पंद्रह साल बड़ा हूँ तुमसे |

प्यारी सी मुस्कुराहट तुम्हारे चेहरे पर | “सर ” नहीं कह पाऊँगी ,प्यार किया है तुमसे | नहीं मिमी ,एक शिष्या अपने गुरु से प्रभावित होती है ,एक अनोखा आकर्षण होता है स्त्री -पुरुष के बीच ,यदि तुम्हारी इंग्लिस की प्रोफेसर कोई स्त्री होती तो शायद तुम समझ पाती ,उस आकर्षण को प्यार समझ बैठी तुम |
“पर तुमने भी तो समझाया नहीं कभी नहीं कहा अपनी तरफ से कुछ गुंज “‘ तुम्हारी आत्महत्या की कोशिश के बाद ही मुझे  पता चला की तुम कितनी गंभीर रही हो मेरे बारे में , बस उन्ही दिनों नॉवेल लिख रहा था ,सो  तुम चरित्र में ढलती चली गई  ‘|
अतीत भूलने के लिए ही होता है शायद ,पर आपको क्या हुआ ? कैसे यहाँ है ? यह मेरा हक़ बनता है आपसे आपके बारे में कुछ जानने का ? ‘एक शिष्या का अपने गुरु पर सबसे ज्यादा हक  होता है मिनी ‘|
सब कुछ ठीक चल रहा था ,उन्ही दिनों एक एक्सीडेंट हुआ ,शरीर  काफी खून बह चला था ,शहर के सबसे बड़े अस्तपताल में सबसे अच्छे डॉक्टर थे बचाने के लिए पर बदकिस्मती से मेरे ग्रुप का खून नहीं मिला , डॉक्टरों  ने अंतिम उम्मीद में आसपास जैसे तैसे कर कुछ लोगो से ,तो कुछ रिश्तेदारों से लेकर बचा तो  लिया मुझे पर कुछ ही महीनो बाद अशक्त पड़ते बदन व बुखार की पीड़ा झेलते -झेलते पता चला की मुझे एड्स है खून देने वाला रहा होगा कोई उस वायरस  कैरियर |डॉक्टरों की असावधानी से, ख़ैर शरीर को तो बीमारी ने जकड़ लिया था तथा पत्नी और बच्चो को शक ने | तुम्हारे साथ कई मनगढ़त किस्से सुन रखे थे उन लोगो ने | एड्स आज भी हव्वा है हमारे इस आधुनिक समाज में , चरित्रहीन, आवारा जाने क्या -क्या सोचने लगे | परिवार की अवहेलना ,उनका त्रासदिदायक व्यवहार ,फिर मीडिया ने भी उछालना शुरू कर दिया था ,तुम्हरे साथ ही क्या न जाने किन -किन महिला मित्रो ,जिनसे कभी बहन ,दोस्त के अलावा और कुछ सम्बन्ध नहीं रखा था मैंने | उन्हें भी मेरी प्रेमिका बना डाला | मेरा बेदाग मन बर्दास्त नहीं कर पाया ये सब | ज्यादा तो कुछ शेष न था ,फिर भी बचा -खुचा मेरा जीवन किसी के माथे का कलंक क्यों बने ? बेबस पत्नी -बच्चे कभी अपना खून टेस्ट करवाते तो कभी मेरे छूने भर से एंटीसेप्टिक से हाथ धोते ? एक दिन सबको अकेला छोड़ विरक्त मन से चला आया चुपचाप इस  आश्रम में पर जिंदगी से अभी हार नहीं मानी मैंने |
अपनी बात पूरी करने के बाद मैंने देखा ,गुंज के चेहरे पर अपूर्व शांति थी , कुछ दर्द की आड़ी -तिरछी रेखाओ के बावजूद ,उनका चेहरा किसी ईश्वरीय आभा से चमक रहा था | ‘तुमने अपने बारे में कुछ नहीं बताया ‘ |  मैंने यश के बारे में बताते हुए उनके सामने गुंज के फोटो रख दिए | वह हंस पड़े ,’क्या ये लाचार बूढ़ा अभी भी किसी के काम आ सकता है ‘|
गूंज तुम जितने सामान्य दिखाई पड़ो ,हंसो पर आँखों में अपनों की अवहेलना से आंसू बने खून के कतरे ,बेचैनी ,उदासी नहीं छुपा पाए थे मुझसे | मैं घर लौट आई थी ,पर बहुत बेचैन | यश से सब कुछ साफ -साफ बताकर तुम्हे घर ले आऊं ,इतनी सेवा ,प्यार और मान सम्मान करे हम की तुम सब भूल जाओ ,खून के रिश्ता ही सब कुछ नहीं होते |
मैं जानती थी यश कभी मना न करेंगे , जैसा सोचा था ,वैसा ही हुआ | यश ने हाँ कर दी | पर तुम कहाँ माने  आसानी से ? पहचान गुप्त रखने का आश्वाशन देने पर भी बहुत ना करने के बाद हम तुम्हे घर ले आए थे | मैं जानती थी यश को उस प्रतियोगिता में तुम्हारे फोटो भेजने से मना करना उनकी सबसे बड़ी तमन्ना को ठुकराना था |
मेरे घर आकर सामान्य होने में ज्यादा दिन नहीं लगे तुम्हे ,बेटे के साथ खेलते ,यश से राजनीती ,खेल आदि विषयी पर ढेर सारी बाते ,मुझसे साहित्य की चर्चा ,पढ़ते -लिखते तुम,तुम्हे संतुष्ठ देखकर खुश होती मै ,जीवन अपनीं गति से चल रहा था | तुम नहीं चाहते थे इलाज करवाना पर मेरे व यश के लिए राजी हो गए |
उस दिन बहुत अस्वस्थ लग रहे थे तुम | मुझे बुलाकर कागजो का पुलिंदा थमा दिया – निम्मी  ये मेरा आधा -अधूरा उपन्यास जो तुम्हे ध्यान में रखकर लिखा था , तुम चली गई ,अंत न कर पाया ,जीने लायक ऊर्जा नहीं बची है शरीर में ,इसे अंतिम रूप देकर छपवाना अपने नाम से | ख़ुशी मिलेगी मुझे और हाँ , यश के नाम से वे फोटोग्राफ मैंने प्रतियोगिता में भेजे थे ,पता नहीं परिणाम आने तक मैं न रहूं पर मुझे याद जरूर करना |
तुम सच कह रहे थे , डॉक्टरो की भी यही राय थी , सप्ताह बाद ही तुम्हारी तेजस्वी आत्मा ने शरीर का साथ छोड़ दिया था |
यश ने बहुत कहा तुम्हारे घरवाले को सुचना देने के लिए | मैं भी यही चाहती थी | बेटे ने तुम्हारी चिता को अग्नि दी , महीनो तक तुम पर लेख , श्रद्धांजलि सभाए होती रही तुम्हे साहित्य रत्न पुरुस्कार दिया गया |
तुम चले गए कर्ज उतारकर | संयोग ही था की तुम्हारा वह उपन्यास जो तुमने मुझे सौंपा था ,अन्तराष्ट्य स्तर पर प्रसद्धि प्राप्त करने लगा और यश को प्रतियोगिता में मिला बेस्ट फोटोग्राफर का इनाम |
कोई कर्ज नहीं छोड़ा तुमने वर्ना अगले जन्म में तुम्हारे साथ कोई रिश्ता चाहे पति का हो या पुत्र का जरूर मांगती ईश्वर से | आज आंखे बंद करती हूँ तो तुम्हे कभी ‘ सर ‘, कभी पहले प्यार के रूप में पाती हूँ | समाज ,परम्परा ,उम्र ,दैहिक आकर्षण ,श्रद्धा ,प्यार प्लेटोनिक लव ही है | कुछ रिश्ते सब दायरों से परे होते है ,ऐसा तुमने कहा था  –  मैं आज मानती हूँ। ……….

कहानी लेखक – साधना जैन

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