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बचपन फिर से ( Hindi Poem on Childhood )

बचपन पर कविता  Hindi Poem on Childhood –



होकर चिंतामुक्त मस्ती से जिया जायें

क्यूँ ना एक बार फिर से बचपन में चला जायें


सुबह को उठना और खेलना बड़ी हसीं जिंदगानी थी,

जब थककर घर को आते दादी सुनाती कहानी थी।


दोस्तों संग में सैर सपाटे मौज बनायीं जाती थी,

हम दुलारे माँ बाबा बात प्यार से समझाई जाती थी।


छुट्टियों में नानी घर जाने की ज़िद हमारी होती थी,

छोटी छोटी ज़िद की भी पूरी सुनवाई होती थी।


बड़े होते गये ज़िम्मेदार हमें बताया गया,

रहन सहन के तौर तरीक़ों को भी समझाया गया।


बहुत सताने लगी ज़िंदगी तनाव से पूर्ण हुई,

लगता है जैसे हँसी ग़ायब सम्पूर्ण हुई।


एक तरफ़ अभिशाप बनकर बेरोज़गारी सताती है,

क्रूर रूप कर धारण महँगाई तड़फ़ाती है।


याद नही हमको रहता ख़ुशी किसे कहते है,

कोई एक बार हमें पूछे इतने दुःख कैसे सहते है।


इधर उधर की फ़िक्र लगी, चिंता बहुत सताती,

ये ज़िंदगी भी देखो हम पर कैसे हुक्म चलातीं।


एक रुपया हाथ में लेकर चलो बादशाह बना जायें,

क्यूँ ना एक बार फिर से बचपन में चला जायें।

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