परिंदे – हिन्दी कविता

परिंदे  (Parinde) कभी – कभी सोचता हूँ  क्या होता होगा उन परिंदों का , जिनके घर नहीं होते , राह तो होती है , मगर सफर नहीं होते , लगता …

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