जाने किस कशमकश में जाने किस कश्मकश में, जिंदगी गुजरती जा रही है, न जाने मैं अपना न पाई या, जिंदगी मुझे आजमाती रही, बहुत हीं कच्ची डोर में, ये पतंग फँसी हुई है, न जाने किस गुमाँ में, उड़ती चली जा रही
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  गर्मी में सबसे ज्यादा हमें पसीने की समस्या से जूझना पडता है, और ऐसे मौसम में अगर वजन घटाने की बात की जाये तो और पसीने छूट जाते हैं। लेकिन इस मौसम में अगर वजन घटाया जाये तो वह काफी लाभदायक
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कुछ तो बात है कि अब बात नहीं करते हम, असर ये है कि अब खुद से मुलाक़ात नहीं करते हम। उनकी तफ़्तीश गवारा भी नहीं पर उनसे, बेतकल्लुफ़ भी सवालात नहीं करते हम। कहेगा ज़माना गरीब हो, बस यही सोचकर, बेवज़ह
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खामोशी खामोशी में एहसास-ए-कारवाँ,छुपा होता है,खामोश निगाहों में दिल-दीवाना,छुपा होता है,खामोश अरमानों में दर्द पुराना,छुपा होता है,खामोश काली घटाओं में,बादल-बिजली का अफसाना,छुपा होता है,खामोशी गर दूर तक साथ निभाए,तो समझों दास्ताँ-ए-राज़ गहरा है,सताए,समाज के हथकंडों का,समय पर गहरा पहरा है जमाए,खामोश हों
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एक राजा ने बहुत ही सुंदर ”महल” बनवाया और महल के मुख्य द्वार पर एक ”गणित का सूत्र” लिखवाया….एक घोषणा की कि इस सूत्र से यह ‘द्वार खुल जाएगा …और जो भी इस ”सूत्र” को ”हल” कर के ”द्वार” खोलेगा में उसे
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 कृतज्ञता बहुत डिवाइन, बहुत दिव्य बात है। हमारी सदी में अगर कुछ खो गया है, तो कृतज्ञता खो गयी है, ग्रेटीटयूड खो गया है। आपको पता है, आप जो श्वास ले रहे हैं, वह आप नहीं ले रहे हैं। क्योंकि श्वास जिस
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इंसान जाने कहां खो गये- “जाने क्यूंअब शर्म से, चेहरे गुलाब नही होते।जाने क्यूंअब मस्त मौला मिजाज नही होते। पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें।जाने क्यूंअब चेहरे, खुली किताब नही होते। सुना हैबिन कहेदिल की बातसमझ लेते थे।गले लगते हीदोस्त
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मनुष्य ने जितनी सभ्यता विकसित की है वह श्रम से मुक्त हो जाने के लिए की है। जब भी कुछ लोग श्रम से मुक्त हो गये तो उन्होंने काव्य रचे, गीत लिखे, चित्र बनाये, संगीत का सृजन किया, परमात्मा की खोज की।
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आरक्षण पर शानदार हिंदी कविता करता हूँ अनुरोध आज मैं, भारत की सरकार से,प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…वर्ना रेल पटरियों पर जो, फैला आज तमाशा है,जाट आन्दोलन से फैली, चारों ओर निराशा है… अगला कदम पंजाबी बैठेंगे, महाविकट हडताल
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