Write For UsPublish Your Blogs For FREE!

ग़ज़ल – तेरे ख़तो से रुह निकालने कि कोशिश की है

तेरे ख़तो से रुह निकालने कि कोशिश की है।
मौजूद नहीं आप के अक्श संवारने कि कोशिश की है।
बड़ी बेरुखी लेकर आया बसंत इस बार.
तेरे खतो से दिल लगाने कि कोशिश की है।
नागवार रहा आपकों हमसें दिल्लगी के किस्से.
तेरी अक्शों से मोहब्बत करने कि सोची है।

ब़िफर गया मौसम हमसे तेरी खैरियत जो पूछी.
हवाओं से उसकी हसरतों कि खैरियत जो है, पूछी.
लिखे जो हमने ख़त आपको कई – कई बार.
हवाओं में आज उड़ा दिया पतंग बना धागों के साथ.
उड़ता ही नहीं पतंग लगता दिल्लगी का बोझ है।
तेरी अक्शों से मोहब्बत करने कि सोची है.

जब तक पड़ा रहा ख़त मेरे बिस्तरों में तेरे होने कि एहसास थी.
हर सितम को बांहो में थाम करती यही अरदास थी .
अब किस से मोहब्बत का ऐतराज़ होगा.
का़गजो से कैंसे रुहों का इस्तकबाल होगा.
इस प्यार के मौसम में तूम मेरे श़जर की छांह बन जा.
तेरी अक्शों से मोहब्बत करने कि सोची है.

अवधेश कुमार राय “अवध”

Author Details
Blogger

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *