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हिंदी कविता – एक शहीद की माँ



साँझ होते ही दरवाज़े पर बैठ जाती है,

आँखों में दुलार भरे सपने सजाती है।


उसके दर्द सुन सुनकर घर की देहरी भी ऊब जाती है,

ये और कोई नही एक शहीद की माँ कहलाती है।


अनायास ही उसे वो पल याद आ जाता है,

जब उसका एक़लौता बेटा सीमा पर जाता है।


वचन दिया था एक माँ को माँ की रक्षा करने का,

याद आ रहा था वादा उसका देश के लिए मरने का।


कई बार हुई फ़ोन पर बातें, माँ सबकुछ ठीक यहाँ है,

माँ जल्दी घर आने की अभी फ़ुर्सत कहाँ है।


गर्वित होती माँ अपनी ममता को छुपा लेती है,

खुले दिल से प्यारे बेटे को आशीर्वाद देती है।


बस एक दिन ज़ालिम दुश्मन ने अपना जाल बिछाया था,

हुआ अमर वो वीर देश का दुःख का बादल छाया था।


माँ को ख़बर नही थी घर पर हुजूम जुड़ रहा था,

उसे नही पता था तिरंगे में उसका बेटा आ रहा था।


बेटा पर गर्व हुआ भारी, दुःख से व्याकुल हुई,

मुर्छित होती हुई जननी अपने लाल के पास गयी।


व्याकुल माँ के मुख से एक कथन निकला था,

जा बेटा इंतज़ार करूँगी, तेरा ये एहसान पिछला था।


घर की अलमारी में उसकी वर्दी टँगी होती है,

माँ की ममता छुप छुपकर रोती है।


अंदर अंदर ना जाने कितने ग़म सह जाती है 

ये और कोई नही एक शहीद की माँ कहलाती है।

Writer of Poem -(  इंजि. सौरभ कुमार )

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