सलिल सरोज की कविता : आधा प्रेम

By | December 20, 2019


















मेरे खेत की मुँडेर पर
वो उदास शाम आज भी 
उसी तरह बेसुध बैठी है
जिसकी साँसें सर्दी की
लिहाफ लपेटे ऐंठी है

मुझे अच्छी तरह याद है
वो शाम
जब तुम
दुल्हन की पूरी पोशाक में
कोई परी बनकर
आई थी

जब सूरज
क्षितिज पर कहीं
ज़मीन की आगोश में
गुम हो रहा था
चाँद अपने बिस्तर से 
निकल कर
सितारों के साथ
अपनी छटाएँ
बिखेर रहा था
ठण्ड की बोझिल हवाएँ
मेरे बदन के रोएँ
खड़ी कर जाती थी
और
इन हालातों में 
सिर्फ और सिर्फ
तुम याद आती थी

तुम्हारे होंठों पर
कहने के लिए
कई उम्र की बातें थी
आँखों में बहने के लिए
पूरा एक समंदर था
और
चेहरे की शिकन में
मजबूरियों का कोई पिटारा
जो बस खुलता
और खत्म कर जाता
हमारे इश्क के सारे
वो अफसाने
जो दुनिया की निगाहों में
खटक रहा था
मैं तुम्हारे काबिल नहीं
और 
तुम मेरे काबिल नहीं
हर कोई 
बस यही
कह रहा था

तुमने भींगे लफ़्ज़ों से
इतना ही कहा
ये हमारी आखिरी मुलाक़ात है
और 
फिर उसके आगे 
मैं कुछ न सुन सका

हर गुजरता लम्हा
मेरे साँस की आखिरी
तारीख़ लग रही थी

आँखें बर्फ सी जम गई थी
तुम्हारी आँखों में
और जिस्म सारा 
इस संसार से ऊब चुका था

मैं बस इतना ही पूछ सका
“आखिर क्यों”
और
वो बस इतना ही बोल सकी
“लड़कियों को मोहब्बत भी
ज़माने से 
पूछ कर करनी पड़ती है
और 
उसकी कीमत ज़िन्दगी भर चुकानी पड़ती है

मैं कल किसी और की हो जाऊँगी
शरीर से जीवित रहूँगी
पर
आत्मा से मर जाऊँगी”

Writer – ( सलिल सरोज )

Attachments area

 2 total views,  1 views today

Share this

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *