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श्री सत्य साईं बाबा द्वारा भक्तों के दुविधा का निवारण

श्री सत्य साईं बाबा द्वारा भक्तों के दुविधा का निवारण-

 

प्रश्न: स्वामी, आपकी कृपा कैसे जीतें?

उत्तर: सभी इच्छाओं को त्याग कर, अपने दिल को शुद्ध रखो | तब मैं बिना माँगे तुम्हारी सारी मनोकामना  पूरी करूँगा |

प्रश्न: स्वामी वह क्या है जो मनुष्य को सत्यता से आवृत कर देता है |

उत्तर: यह केवल मन है जैसे बादल जो सूर्य की किरणों से उत्पन्न होते हैं, सूर्य को हीं आवृत्त कर देते हैं|
और जब तेज हवा चलती है, तो बादल बिखर जाते हैं | फिर हम सूर्य को देख सकते हैं। वैसे ही मन आत्मा                  को  आवृत  कर देती है जिससे वह उत्पन्न हुई है। आज मनुष्य अज्ञानता में डूब चुका है,तथा शांति और खुशी से दूर होता जा रहा है।

प्रश्न: स्वामी, अपनी आध्यात्मिक शक्ति कैसे विकसित करें?

उत्तर : किसी को आध्यात्मिक शक्ति की खोज करने, दुनिया भर में जाने और बहुत पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है अपने घर में रहो, अपने आप में इसे विकसित करो , आप में हीं आध्यात्मिक शक्ति निहित है| भगवान तुम्हारे बाहर नहीं है, भगवान तुम्हारे अंदर है तुम एक आदमी नहीं हो , तुम अपने भगवान खुद हो, लेकिन तीन:- जो तुम्हे लगता है कि१. तुम शरीर हो,२.लगता है कि तुम बुद्धि हो, और ३.तुम सच में कर रहे हो। ये तीन अलग-अलग नहीं है,ये तीनो तुम हीं हो | भ्रमित मत हो, भगवान कहीं बाहर नहीं तुम्हारे अंदर हैं |

प्रश्न:स्वामी, एकाग्रता और ध्यान में क्या अंतर है?

उत्तर : कई लोग सोचते हैं कि एकाग्रता और ध्यान एक ही बात है, लेकिन एकाग्रता और ध्यान के बीच ऐसा कोई संबंध नहीं है। एकाग्रता वह है जो आपके इंद्रियों के वश में है, जबकि ध्यान वह है जो आपके इंद्रियों से ऊपर है। लेकिन कई लोग झूठी धारणा के तहत समझते हैं कि एकाग्रता और ध्यान एक हीं है, और वे गलत रास्ते पर ले जाते हैं। एकाग्रता वह है जो हम अपने दैनिक जीवन के सामान्य दिनचर्या में अनायास उपयोग करते हैं। जबकि ध्यान में हम आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं |

प्रश्न: स्वामी, इस जीवन में हमारी भूमिका क्या है?

उत्तर : मंच पर आने से पहले तुम केवल एक अभिनेता हो, निर्देशक जो नाटक  को जानता है, जो भूमिका तय करता है, तुमको रंगमंच में शामिल करता है,वो संकेत देता है कि वह पर्दे  के पीछे है और तुम एक कठपुतली हो वह तुम्हारी डोर अपने हाथ में रखता है यदि उसे देखना चाहते हो  तो तुम्हें उससे ‘सखा’ (मित्र) या ‘बंधु’ (रिश्तेदार) का नाता जोड़ना पड़ेगा । प्यार और समर्पण के द्वारा तुम उससे निकटता  प्राप्त कर सकते हो |

प्रश्न: स्वामी, जीवन में किस सिद्धांत का हमें पालन करना चाहिए?

उत्तर : दूसरों की गलतियों की ओर इशारा करने से पहले, खुद की जांच करो और अपने आप को आश्वस्त करो  कि तुम दोषों से मुक्त हो, लेकिन आश्चर्य यह है कि आप दूसरों में दोषों की खोज करते हैं, जबकि आप में दोष होते हैं। पहले स्वंय को दोषमुक्त करो, फिर सब शुद्ध और अच्छे प्रतीत होंगे। यही प्यार की दिव्य क्रिया है,   दिव्य प्रेम, सार्वभौमिक प्रेम और प्रेम के लिए प्रेम का सिद्धांत है |

 

 

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