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वृद्धावस्था-पर-लेख Essay on Old Age

वृध्दावस्था जीवन की वह अवस्था है जिसमे शरीर कमजोर व् अशक्त हो जाता है तथा दुसरो की सहायता चाहता है इन अवस्था में व्यक्ति परिजनों का अपनापन व् उनका प्यार चाहता है   लेकिन दुर्भाग्य से उसे मिलती है परिजनों से उपेक्षा ,जिसके बारे में वह सोच भी नहीं सकता , क्योंकि जिन हाथो से उसने अपने बच्चो को चलना सिखाया ,उनकी हर सुख सुविधा का ध्यान रखा , जीवन के इस पड़ाव में उसके वही बच्चे उसका ध्यान रखना तो दूर उससे ठीक से बात करना भी   पसंद नहीं करते |

६० वर्ष का होने पर अधिकतर व्यक्ति सेवानिर्वत होना चाहते है और उनके बच्चो को अपनी जिम्मेदारी सौंपकर उन्हें आगे बढ़ाना चाहते है , लेकिन एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक पता चला है की देश में ७२ प्रतिशत बुजुर्ग इस उम्र में भी अपना पेट भरने के लिए अथवा अपनी आर्थिक आवश्कताओं की पूर्ति के लिए नौकरी या अन्य कोई काम करने के लिए विवश है | यही नहीं आज की इस युवा पीढ़ी में बुजुर्गो के प्रति असंवेदनशीलता इस कदर बढ़ी है की इस उम्र में उनकी मदद करना तो दूर ,  वे उन्हें और श्रम करने और पैसा कमाकर देने के लिए मजबूर करने में शर्मिंगी भी महसूस नही करते  |

आज का कडुआ सच तो यही है की जिन्होंने हमे चलना सिखाया ,हम उनके साथ नही चल पा रहे है  अधिकाश बुजुर्ग व्यक्ति या तो घर के किसी कोने में अकेलापन भोग रहे है या बहु – बेटों की झिडकियां सुनते हए अपने जिन्दा होने को कोस रहे है , कही उन्हें घर के बाहर का रास्ता दिखा ,तो कही वे विदेश गए बच्चो का इन्तजार करते हुए नौकरों के सहारे जिंदगी काट रहे है

हमारे देश में माता –पिता अपने बेटे बेटियों की शिकायत करना की मानसिकता बिलकुल नहीं रखते और इसीलिए उनके अमानवीय बरताव को सहते चले जाते है संभवतया कुछ लोग उनकी साथ दुर्व्यवहार करने से भी नहीं चुकते |

वृध्दावस्था में मिलने वाले इन कष्टों के कारण शायद लोग इस अवस्था तक आते आते शरीर के अंग –प्रत्यंग शिथिल पड़ जाते है और इंसान की जिंदगी दुसरे की दया कृपा पर निर्भर हो जाती है इस अवस्था में व्यक्ति मानसिक तनावों से ग्रस्त रहता है ,उसके स्वभाव में चिडचिडापन आ जाता है और उसकी याददाश्त कमजोर हो जाती है |

माता –पिता के वृद्ध हो जाने पर यदि आज के बिगड़े हुए उनके बच्चो की स्थिति का जायजा ले तो यह बात पता चलती है की  उनकी इस अवस्था तक पहुँचते पहुँचते संतान अक्सर उनसे छुटकारा पा लेना चाहती है क्योंकि वह इन्हें बोझ और अपनी ऐशोआराम भरी जिन्दगी की सबसे बड़ी बाधा मानती है ऐसे संवेदनहीन  बच्चो को यह एहसास भी नहीं होता की वे उन्ही माता –पिता के कारण ही इस सुख सुविधा से भरी जिंदगी को जी पा रहे है उनके यही माता –पिता उनके बच्चे बचपन की जरूरतों से लेकर उनके कैरियर निर्माण और शादी विवाह की जिम्मेदारी उठाने तक का अपना दायित्व निभाते रहे | यह करते समय संभवतया उन्होंने सोचा होगा की बुढ़ापे में उनका एकमात्र सहारा उनके बच्चे ही है, जो उनकी देखभाल करेंगे लेकिन समय बदलने के साथ लोग भी बदल जायेंगे इसका उन्हें भान भी  होगा |

बुजुर्गो और बहु – बेटो में सामंजस्य न हो पाने की एक वजह पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव व् रुढिवादिता भी है पश्चिम का अंधानुकरण बड़े –बुढो को नहीं भाता और बहु – बेटो को बुजुर्गो का उनकी जिंदगी में यह दखल अच्छा नहीं लगता | बुजुर्ग लोगो को अपनी परंपराए , निर्णय ,विचार सही लगते है ,वे आज की परीस्थिति में होने वाले परिवर्तनों को न तो बहुत अच्छा मानते है और नहीं उन्हें आसानी से स्वीकार कर पाते है, लेकिन उनकी संताने जीवन में नए आयाम व् परिवर्तनों को फैशन मानती है और उनकी अवज्ञा करने को अपना अधिकार | दोनों पीढियों के बीच पनपती दुरिया कब खाइयो में बदल जाती है इसका पता ही नहीं चलता |

बहुत से लोग पीढियों के बीच बढती दुरी को ही इन अमानवीय घटनाओं का कारण मानते है ,जबकि यह बात गलत है सच तो यह है की सुविधाएँ बढने के साथ साथ मनुष्य उतना ही स्वार्थी हुआ है और उसके स्वार्थ की पूर्ति में उसे जो भी बाधक लगता है ,वह उसके साथ अनुचित आचरण करने लगता है ,चाहे वह उनके माता –पिता ही क्यों न हो | इसीलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता मनुष्य को स्वार्थ की संकीर्णताओ से परे जाकर मानवता सिखाने की है |

वृध्दावस्था जीवन की आखिरी पड़ाव है ,इस बात का एहसास आज के युवाओ को होना चाहिए ,क्योंकि किसी दिन इस स्थिति का उन्हें भी सामना करना है | जो  परीस्थिति आज वे अपने माता –पिता को दे रहे है क्ल उनके बच्चे भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव कर सकते है और अगर न भी करे तो भी उनके द्वारा माता –पिता के प्रति किए गए बुरे व्यवहार को उनके कर्म कभी भी क्षमा नहीं करेंगे और समय आने पर उन्हें दण्डित करेंगे माता पिता तो भगवान की तरह होते है ,जिनकी सेवा करो तो ढेरो आर्शीवाद मिलते है और जीवन सफल बनता है |

व्यक्ति वही पाता  है जो वह बोता है और इसलिए माता –पिता की सेवा करना ,उनका ध्यान रखना ,उनके अनुभवों से सीखना ,उन्हें सम्मान देना ,उनसे अच्छा व्यवहार करना यही तो अच्छे कर्म होते है जिनके द्वारा आप अपने को धन्य कर सकते है | माता –पिता का जो भी ऋण बच्चो पर होता है ,उसे कुछ भी करने पर चुकाना आसान नहीं होता | अपनेपन का ऋण अपनापन देकर ही चुकाया जा सकता है |

 

 

 

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