विश्वास ही व्यक्तित्व विकास का आधार

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विश्वास हमारे व्यक्तित्व की ऐसी विभूति है जो आश्चर्यजनक ढंग से हमसे बड़े से बड़े और महान कार्य करा लेती है | जीवन में विश्वास के दो रूप है आत्मविश्वास और ईश्वरविश्वास | ये  एक ही सिक्के के दो पहलू है , परन्तु विश्वास यों ही पैदा नहीं हो जाता | विचार और भाव की ऊर्जा जहाँ केंदित और सघन हो जाती है तो वहाँ विश्वास पैदा होता है | ऐसा विश्वास अत्यंत दृढ़ ,अविचल और अडिग होता है | यह डिगता नहीं क्योंकि विचारो की ऊर्जा कंपित नहीं होती है| ऐसा विश्वास यदि परमपिता परमात्मा के पावन चरणों में निछावर हो जाय तो व्यक्ति स्वयं को बलिदान कर देता है ,परन्तु अपने विश्वास को नहीं |

विश्वास वो नही , जो किसी भी आघात से टूटने – बिखरने लगे विश्वास उस टिमटिमाते दीपक की लौ नहीं , जो फूंक मारने से भी कंपित हो जाय ,बल्कि वह तो दावानल है , जो आँधी और तूफान से बुझने के बजाय और भी प्रज्वलित हो उठता है | विश्वास की प्रबलता एवं दृढ़ता की विपरीतताओ और चुनोतियो में ही परीक्षा होती है |

सुदृढ़ विश्वास किसी भी चुनोती से घबराता नहीं , बल्कि उससे पार पाने के लिए अपनी राह निकालकर आगे बढ़ जाता है | विश्वास यदि प्रबल एवं प्रखर हो तो भय – भ्रम , शंका –कुशंका आदि नहीं होते है ये सारी बाते तो आत्मविश्वास की कमी के कारण पैदा होती है और मन एवं ह्रदय को खोखला कर देती है |

आत्मविश्वास का धनी किसी भी भीषण एवं भयावह परीस्थिति से भयभीत नहीं होता है | ईश्वर पर विश्वास करके संसार के किसी भी भय और लोभ से विचलित नहीं होता है | संसार में विश्वास को डिगाने के लिए दो चीजे होती है , मनुष्य या तो भय से विश्वास खोता है या लोभ से विचलित होता है ऐसा विश्वास अत्यंत दुर्बल होता है संसार भय बनाकर विश्वास तोड़ता है ,और यदि कोई भयभीत नहीं होता है तो यह प्रलोभन के दृश्य दिखाकर उसे डिगाने का प्रयास करता है | वह विश्वास ही कैसा , जो भय से भयभीत हो जाय और लोभ से विचलित हो उठे ?

संत मंसूर को सूली पर लटका दिया | सूली में टांगने से पूर्व उनके हाथ को निर्ममता से काट दिया गया फिर पैरो को शरीर से अलग कर दिया गया , जल्लाद जब उनकी जीभ काटने को आया तो उन्होंने कहा –“ जरा ठहर जाओ | मुझे कुछ कहना है | देरी के लिए माफ़ करना ,पर जीभ कटने के बाद मैं परमेश्वर से इस जीभ से कुछ कह न सकूंगा | इस जीवन के अंत में केवल दो शब्द परमात्मा से गुहार लगा लेने दो |” और उन्होंने कहा – “ हे परमात्मा ! तुम इस नादान इन्सान को माफ़ कर देना | यह तो अपन कर्तव्य निभा रहा है | इसने मेरी यात्रा को आगे बढने में सहायता की है | मेरी मंजिल की दुरी को कम कर दिया है | अत: इसे माफ़ कर देना और मेरे जो पूण्य है उन्हें इसे देकर सुखी एवं समृद्ध बना देना “ मंसूर का सिर काटकर सूली पर चढ़ा दिया गया | इस क्रूरता के बावजूद परमात्मा के प्रति उनका विश्वास प्रगाढ़तम  ही होता गया और उन्होंने सूली पर टांगने वालो के प्रति अंत तक सद्भाव बनाए रखा |

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