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बनारस घाट पर एक ‘अद्भुत’ कविता By अवधेश कुमार राय

आज फिर मौत का जिंदगी से जश्न हो गया है.
सारी रात जलती रही चिंगारी लहरों से रस्क़ हो गया है.
सुलगती रही एक खामोश जिंदगी पूरी रात करवटें बदल.
हर आग की लपटों से उड़ती चिंगारी को मोहभंग हो गया है.
कैसी शिद्दत कैसी चाहत लाशों के बीच सुलगने का होड़ बन गया है.
जो जलते रहे आपस में गरीबी अमीरी की रेखाएं खींच अपने इर्द-गिर्द.
जिंदगी की जद्दोजहद का आखिरी यह छोर बन गया है.
बुझाती रही गंगा अपने लहरों से तन के भीतर की आग.
अग्नि ने स्पर्श से मिटाती मानव में जो विद्यमान हैं भेदभाव.
मौत का टीला या कहें घाट बनारस जिंदगी का आखरी निशान बन गया है.
मणिकर्णिका से हरिश्चंद्र घाट जिंदगी का सत्य बन गया है.
जलती चिता की खामोशी में कहीं ठंडक है बरकरार.
गंगा की लहरों पर मिली है आखरी पूर्ण विराम.
सारी रात जलती रही चिंगारी लहरों से रस्क़ हो गया है.

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