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पूरब की स्‍त्री गुलाम है – ओशो

पूरब की स्‍त्री गुलाम है।

उसने कभी यह घोषणा ही नहीं की कि मेरे पास भी आत्मा है। वह चुपचाप पुरूष के पीछे चल पड़ती है।

अगर राम को सीता को फेंक देना है तो सीता की कोई आवाज नहीं। अगर राम कहते हैं कि मुझे शक है तेरे चरित्र पर तो उसे अण में डाला जा सकता है। यह बडे मजे की बात है। यह किसी के खयाल में कभी नहीं आती कि सीता लंका में बंद थी, अकेली, तो राम को उसके चरित्र पर शक होता है। लेकिन सीता को राम के चरित्र पर शक नहीं होता! उतने दिन वह अकेले रहे! अग्रि से गुजरना ही है तो राम को आगे और सीता को पीछे गुजरना चाहिए। जैसा कि हमेशा शादी विवाह में राम आगे रहे, सीता पीछे रही, चक्कर लगाती रही। फिर आग में घुसते वक्त सीता आगे अकेली आगे चली। राम बाहर खड़े निरीक्षण करते रहे! बड़ी धोखे की बात मालूम पड़ती हैं!

तीन—चार हजार वर्ष हो गए रामायण को लिखे गए और मैं यह बात पहली दफे कह रहा हूं। यह बात कभी नहीं उठाई गई कि राम की अग्रि परीक्षा क्यों नहीं होती? नहीं, पुरुष का तो सवाल ही नहीं! यह सब सवाल स्‍त्री के लिए है!

स्‍त्री की कोई आत्‍मा नहीं, उसकी कोई आवाज नहीं। फिर यह अग्‍नि परीक्षा से गुजरी हुई स्‍त्री एक दिन मक्खी की तरह फेंक दी गई तो भी कोई आवाज नहीं! कोई आवाज नहीं है! और हिन्दुस्तान भर को स्रियां राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहे चली जायेंगी! मंदिर में जाकर दीया घुमाती रहेंगी और पूजा—प्रार्थना करती रहेंगी! राम की पूजा स्रियां करती रहेंगी!

स्‍त्री के पास कोई आत्मा नहीं। कोई सोच—विचार नहीं। सारे हिन्दुस्तान की स्त्रियों को कहना था कि बहिष्कार हो जाये राम का, कितने ही अच्छे आदमी रहे हणै। लेकिन बात खत्म हो गई। स्रियों के साथ भारी अपमान हो गया। भारी असम्मान हो गया।

लेकिन राम को स्रियां ही जिन्दा रखे हैं। राम बहुत प्यारे आदमी हैं। बहुत अदभुत आदमी हैं। लेकिन राम को यह खयाल पैदा नहीं होता कि वह स्‍त्री के साथ क्या कर रहे हैं! वह हमारा कल्पना नहीं है, वह हमारे खयाल में नहीं है।

युधिष्ठिर जैसा अदभुत आदमी द्रौपदी को जुए में दांव पर लगा देता है! फिर भी कोई यह नहीं कहता कि हम कभी युधिष्ठिर को धर्मराज नहीं कहेंगे। नहीं, कोई यह नहीं कहता! बल्कि कोई कहेगा तो हम कहेंगे कि अधार्मिक आदमी है। नास्तिक आदमी है, इसक़ी बात मत सुनो!

स्‍त्री को जुए पर, दांव पर लगाया जा सकता है, क्योंकि भारत में स्‍त्री सम्पदा है, सम्पत्ति है। हम हमेशा से कहते रहें हैं, स्‍त्री सम्पत्ति है और इसीलिए तो पति को स्वामी कहते हैं। स्वामी का मतलब आप समझते हैं, क्या होता है?

अगर हिन्दुस्तान की स्‍त्री में थोड़ी भी अक्ल होती तो एक—एक शब्द से उसे ‘स्वामी’ निकाल बाहर कर देना चाहिए। कोई पुरुष कोई स्‍त्री का स्वामी नहीं हो सकता। स्वामी का क्या मतलब होता है?

स्‍त्री दस्तखत कर देती है अपनी चिट्ठी में  ‘आपकी दासी’ और पति देव बहुत प्रसन्न होकर पढ़ते हैं। बड़े आनन्दित होते हैं कि बड़ी प्रेम की बात लिखी है।

लेकिन इसका पता है कि स्वामी और दास में कभी प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम की संभावना समान तल पर हो सकती है। स्वामी और दास में क्या प्रेम हो सकता है?

इसलिए हिंदुस्तान में प्रेम की संभावना ही समाप्त हो गई। हिंदुस्तान में स्‍त्री—पुरुष साथ रह रहे हैं और साथ रहने को प्रेम समझ रहे हैं! वह प्रेम नहीं है।

हिंदुस्तान में प्रेम का सरासर धोखा है। साथ रहना भर प्रेम नहीं है। किसी तरह कलह करके 24 घंटे गुजार देना, प्रेम नहीं है। जिंदगी गुजार देनी प्रेम नहीं है।

प्रेम की पुलक और है। प्रेम की प्रार्थना और है। प्रेम की सुगंध और है। प्रेम का संगीत और है।

लेकिन वह कहीं भी नहीं! असल में गुलाम और दास में, मालिक में और स्वामी में, कोई प्रेम नहीं हो सकता। लेकिन हमारे खयाल में नहीं है यह बात कि पूरब की स्‍त्री नेहु विशेषकर भारत की स्‍त्री ने अपनी आत्मा का अधिकार ही स्वीकार नहीं किया है। आत्मा की आवाज भी नहीं दी है। उसने हिम्मत भी नहीं जुटाई कि वह कह सके कि ‘मैं भी हूं!

आज स्‍त्री को शादी करके ले जाते हैं एक सज्जन। अगर उनका नाम कृष्णचन्द्र मेहता है तो उनकी पत्नी मिसेज कृष्णचन्द्र मेहता हो जाती है। लेकिन कभी उससे उलटा देखा कि इन्दुमती मेहता को एक सज्जन प्रेम करके, ब्याह कर लाये हों और उनका नाम मि. इन्दुमती मेहता हो जाये? वह नहीं हो सकता है। लेकिन क्यों नहीं हो सकता? नहीं, वह नहीं हो सकता, क्योंकि हमारी यह सिर्फ व्यवहार की बात नहीं है, उसके पीछे पूरा हमारे जीवन को देखने का ढंग छिपा हुआ है।

 ओशो

सभोंग से समाधि की ओर

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