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परिंदे – हिन्दी कविता

परिंदे  (Parinde)

कभी – कभी सोचता हूँ 

क्या होता होगा उन परिंदों का ,

जिनके घर नहीं होते ,

राह तो होती है ,

मगर सफर नहीं होते ,

लगता है शाम को ही उड़ जाते है वो ,

महफूज ठिकानो  को ,

मगर इन सर्द रातो में ,

ठिकाने महफूज नहीं होते ,

लगता होगा उन्हें खोंफ इन अंधेरो से ,

इसलिए वो रुक तो जाते है ,

पर सो नहीं पाते ,

सुना है वो परिंदे रोज निकलते है ,

घर बनाने को ,

मगर ,बगैर तिनको के सहारे वो ये 

कर नहीं पाते |

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