देशभक्ति कविता :- अखंड भारत की ओर

By | March 15, 2018

अखंड भारत की ओर

आघातों की राहों में
सुन्दर मुस्कान बढाता जा,
राष्ट्रदूत हे वीर व्रती
भारत को भव्य सजाता जा,
सुस्थिरता को लाता जा ।
अगणित कर्तव्यों के पुण्य पथ पर
शील, मर्यादाओं के शिखर पर
धन्य ! स्वाभिमानी वीर प्रखर
सतत् रहे जो निज मंजिल पर ।
वसुधा की विपुल विभूति तू
विजय का हर्ष लाता जा
सबकी पहचान बनाता जा ।
उपवन कितने हैं लूट चूके
पथ कंटक कितने शूल टूटे
भारत का अखंड रुप ले
कितने अगणित उद्गार फूटे।
जो कुछ भी हो, जग में,
सबको दिलासा दिलाता जा
हे भारत के राष्ट्रदूत
भू, पर व्योम सुधा बरसाता जा ।
महाप्रलय की आफत हो,
सौ-सौ तूफान उठें क्षण-क्षण में ;
आक्रांता में वीर ह्रदय हो
गहरी चोटें हो सीने में |
असह्य वेदना छोड़ जीवन के
नंगी खड्ग उठाता जा
जो हो शोषित,व्यथित,कंपित
उनको मंजिल पहुँचाता जा ।
सपनों में भारत वंदन हो
भूखों मरना हो जीवन में ,
चाहे कितना भी क्रंदन हो
आग लगी हो निज भवन में ।
देशद्रोही, के आगे अपना मस्तक,
कभी न झुकाता जा
हो सर्वनाश की टक्कर निरंतर
पुनः अखंड भारत बनाता जा ।

अखंड भारत अमर रहे
वंदे मातरम् ।
जय हिन्द !

 2 total views,  1 views today

Share this

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *