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दिल्ली में लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं के साथ छेड़छाड़

दिल्ली का दंगल,दिल्ली का ड्रामा,धरना वाला मुख्यमंत्री जैसे शब्द आजकल सुनने को मिल जाते है मीडिया,नेता,संविधान बिशेषज्ञ सबके अलग अलग विचार हैं परंतु जो मुलभूत विचार है उसको ठेंगा दिखाने की कोशिश जरूर की जा रही यह स्पष्ट है।

लोगों का यह मानना है की दिल्ली में यह समस्या तब शुरू हुई जब दो अनुभवी एवं राजनीति में पारंगत पार्टियों को हराकर एक नयी प्रकार की पार्टी सत्ता में आई जिसे राजनीति का अनुभव नहीं है और उक्त पार्टी राजनीति में नौसिखिया है।यह बात दोनों अनुभवी पार्टियों के प्रबक्ता एवं संबिधान विशेषज्ञ वक्त वक्त पर कहते रहे हैं।सच भी है उस तरह का अनुभव जो दोनों पारंगत पार्टियों को है नयी राजनीतिक पार्टियों को लेने से बचना भी चाहिए।

समस्या को समझने की कोशिश करें तो असल समस्या संबिधान एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों को समझने एवं निभाने की है यहाँ महत्वपुर्ण बात यह है दोनों पार्टियों को अनुभव तो है पर बह अनुभव संबैधानिक एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों को ताक़ पर रखकर अपनी राजनीति को चमकाने का ।

राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली के समस्या के लिए संबैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हैं परंतु यह भूल जाते हैं की संबिधान का सबसे मूल उद्देश्य जनतंत्र की स्थापना करना था।संबिधान की प्रस्तावना की शुरुआत “हम भारत के लोग” से होती है एवं आगे लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना की बात कही गयी है यही है संबिधान जिसका मूल उद्देश्य जन कल्याण और मात्र जनकल्याण का है और इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बर्षों तक आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी ताकि लोकतंत्र की स्थापना की जा सके।

1923 के दौर में जब स्वराज पार्टी ने अपनी सरकार बनाई थी तब भी इसी प्रकार की स्थिति थी।1919 के अधिनियम द्वारा चुनाव हुए एवं जनप्रतिनिधि भी चुने गए परंतु शक्तियों का विभाजन कुछ आज की तरह था।प्रांतीय प्रशासन के सभी विषयों को 2 सूचियों में बांटा गया था आरक्षित विषय एवं हस्तांतरित विषय और उस दौर में मुख्य कार्यपालिका अधिकारी governar जनरल होता था ,आज के दौर में मुख्यमंत्री द्वारा धरना दिया जा रहा है यह कोई नई बात नहीं है उस दौर में भी जनप्रतिनिधियों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया जाता था।असेंबली के भीतर भी विभिन्न तरीकों (भाषण द्वारा,स्थगन प्रस्ताव पारित कर,बजट संबंधी मांगों पर सरकार के खिलाफ मतदान) द्वारा विरोध जाहिर किया जाता था।क्योंकि उस दौर में भी बे चुने हुए प्रतिनिधि तो थे पर अधिकार नहीं थे।

अब स्थिति यह है की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में में ही लोकतंत्र का मजाक बनाया जा रहा है।लोकतंत्र का मतलब तो यही होता है की जनप्रतिनिधियों द्वारा शासन का संचालन किया जाए अर्थात राज्य की नीति निर्माण में नागरिकों का प्रतिनिधित्व हो यह तो तभी संभव है जब नीति निर्माण एवं उसे लागू करने का अधिकार चुने हुए जनप्रितिनिधियों को हो। क्योंकि उनसे जनता सवाल पूछ सकती है,उनके दरवाजे पर दस्तक दे सकती परंतु यदि जनप्रतिनिधि जनता को जवाब देने से इंकार करता है अथवा उनकी बात सुनने से इंकार करता है तब जनता को भी अधिकार दिया है की जब नेता उनके दरवाजे पर वोट के लिए दस्तक दे तो वे भी नेता को बापस भेज सके।

अगर अधिकारीयों को समस्त अधिकार दे दिए जाए जैसा की दिल्ली में जारी है तो अधिकारी अपने शयन कक्ष् में विश्राम करता रहेगा और जनता उसके दरवाजे के बाहर इंतज़ार करती रहेगी क्योंकि उसे तो जाना नहीं है वोट मांगने फिर भी अगर अधिकारीयों के पास ही दिल्ली के सत्ता के अधिकतर अधिकार हैं तो अधिकारीयों की दिल्ली की जनता के प्रति जिम्मेदारी भी फिक्स की जानी चाहिए,एलजी को जनता दरवार लगाकर जनता की समस्याएं सुननी चाहिए एवं उनका निपटारा भी करना चाहिए और अगर बे इसे करने में असफल रहते हैं जो की रहे भी हैं (दिल्ली की कानून व्यवस्था को देख ले )तो उनकी जिम्मेदारी भी तय की जाए।यह कैसा लोकतंत्र है की एक व्यक्ति के पास सभी अधिकर हैं पर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पश्चात् भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में स्पष्ट तौर पर कहा गया है की दिल्ली के प्रशासन से सम्बंधित तीन मामलोंं को छोड़कर बाकि सभी मामले दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अंतर्गत आएंगे एवं उनसे सम्बंधित निर्णय लेने का अधिकार जनपतिनिधियों को है।

उतना ही स्पष्ट है जैसे की सुप्रीम कोर्ट ने कहा हो की तीन गेंदें एलजी की टोकरी में बाकि सारी गेंदें दिल्ली की चुनी हुई सरकार की टोकरी में।लेकिन अब ये हरी गेंद,नीली गेंद,पीली गेंद का चक्कर क्या है।अधिकारी लगता है प्रायिकता का पाठ पढ़कर आये हैं।तीन गेंदों को छोड़कर बाकि सब दिल्ली सरकार की टोकरी में।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में संबैधानिक नैतिकता की बात भी कही परंतु राजनीति में नैतिकता पुराने ज़माने की बात है।संबैधानिक विशेषज्ञों की राय भी दिल्ली के बारे में बंटी हुई है उनका मानना है की समस्या का असली कारण दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा की गयी बयानबाज़ी है जबकि वे यह भूल जाते हैं की जब भी केंद्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनी तब तब छेत्रिय पार्टियों एवं विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला जाता रहा है।कर्नाटक बहुत दूर नहीं है जहां संबैधानिक नैतिकता के पुरे सम्मान के साथ चुने हुए विधायकों की भागते भागते सांस फूल गयी थी।उत्तराखंड,अरुणाचल प्रदेश के किस्से भी ज्यादा पुराने नहीं हैं।

दिल्ली के मुद्दे पर कांग्रेस का रुख भी स्पष्ट-

कांग्रेस ने केंद्र में बैठकर एवं संबैधानिक नैतिकता को ध्यान में रखकर भरपूर तरीके से अनुच्छेद 356 का उपयोग किया है तो यहाँ स्थिति स्पष्ट है की कांग्रेस ने अपनी परंपरा को जारी रखा है परंतु एक परिवर्तन आया है अब कांग्रेस की हालात भी छेत्रिय पार्टी की तरह है तो कांग्रेस को इस पर भी बिचार करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में स्पष्ट तौर पर कहा है की संबैधानिक प्राबधनो का अर्थ करते समय लोकतान्त्रिक प्रिक्रियाओं को प्राथमिकता दी जाए। सुप्रीम कोर्ट को लगता होगा की अधिकारी एवं नेता अपनी बुद्धि का उपयोग करेंगे एवं लोकतंत्र का अर्थ उन्हें पता होगा परंतु लगता सुप्रीम कोर्ट को नेताओं को बुलाकर एक कक्षा लोकतंत्र पर भी लगानी चाहिए क्योंकि 70 बर्ष में भी दुनिया का सबसे बड़ा कहलाने वाला लोकतंत्र अभी तक लोकतंत्र नहीं बन पाया।आज भी जनता सिर्फ वोट के लिए बो चाहे नोट से मिले अथवा किसी अन्य तरीके से उसके आगे जनता गायब हो जाती है नेता बच जाता है।सुप्रीम कोर्ट को एक कक्षा लगाकर लोकतंत्र के सही अर्थों को स्पष्ट करना चाहिए ताकि नेता भी अपनी परिभाषा का विस्तार कर सके और नाम के सबसे बड़े लोकतंत्र में असल लोकतंत्र की स्थापना की जा सके। वर्ना तो हमारा लोकतंत्र उस रेलगाड़ी की तरह होगा जिसमे सबसे बड़ी संख्या वाले जनरल क्लास के यात्री के लिए सिर्फ एक डब्बा होता है बचे हुए थोड़े लोगो के लिए पूरी रेलगाड़ी।

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