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जानिए, क्या है धर्म का वास्तविक अर्थ

धर्म नि:संदेह संस्कृति का प्राण है कृति का अर्थ है – कार्य | जब कृति परमात्मा से संयुक्त होकर संचालित होती है,तब संस्कृति कहलाती है |

धर्म – जो शाश्वत है,अपरिवर्तनशील है,सनातन है | अधर्म – जो आज है ,किन्तु कल नहीं रह जाएगा ,नश्वर है | पुनर्जन्म का सिलसिला तबतक नहीं टूटेगा ,जब तक मन के निरोध और विलय के साथ परमात्मा ( स्वयं का स्वयं के साथ मिलन ) का साक्षात्कार करके उसी परमभाव में स्थित न हो जाएं परमतत्व सत के साथ आत्मा की एकात्मता को कैवल्य कहते है | यही समस्त जीवो का  अंतिम लक्ष्य है सम्पूर्ण ह्रदय से मन को समेटकर उसके चरणों में लगा दो ,वे तुरंत प्रकट हो जायेंगे |

धर्म का मतलब वह विधि ,मान ,नियम ,कर्म और जीवन जिसको धारण किया जाता है और जो सब पदार्थो को एकत्र धारण करता है | धर्म (मानसिक सच्चरित्रता ) अनुभूति है , कोई मत नहीं है | वह (धर्म) आकाश ,हवा ,धुप वृक्ष की छाया और वर्षा के पानी की तरह सर्वव्यापी व् सार्वजानिक है धर्म वह है की जब हम उसकी ओर झुकाव ले तो वह हमे धारण के ले , मार्ग बताने लगे , ऊँगली पकडकर चलाने लगे ,ह्रदय से रथी बन जाये ,ह्रदय में ईश्वरीय आदेशो का सूत्रपात होने लगे |

सनातन – जो सदा से था और रहेगा , वह सता है परमात्मा ,वह एक ही है और रहेगा

सृष्टि में धर्म एक ही है – अमृत तत्व की प्राप्ति ,सदा रहने वाले शाश्वत धाम की प्राप्ति | ज्ञानी व्यक्ति की दृष्टी में न गाय धर्म है , न कुता अधर्म | जाती पाती कोई धर्म नहीं है आप कौन है ?

सनातम धर्मी ! सनातन क्या है ? आत्मा ( स्वयं आप )! जन्म पर आधारित जाती व्यवस्था सनातन कैसे हो गयी ? वस्तुत : परमतत्व ,आत्मा ,स्थिर प्राण , चेतना , दिव्यता ,ईश्वर ,स्वयं आप सब एक ही है |

विश्व का प्रत्येक पदार्थ ,वास्तव में ,स्वयं सम्पूर्ण विश्व है सता अविभाज्य है इसलिए प्रत्येक मनुष्य अपने सारतत्व में अन्य सबके साथ एक है ,मुक्त ,सनातन ,एवं अक्षर है और है ‘ प्रकृति ’  का ईश्वर | प्रत्येक पदार्थ अपनी सता का नियम – विधान नित्यतया ,अनंत वर्षी से शाश्वत काल में अपने अन्दर ही धारण किये है |

आध्यात्म ( समत्व एवं एकीकृत विज्ञान ) – अर्थात प्रकृति में स्थित आत्मतत्व |  आध्यात्म धर्म का सार है ,उसका मूल तत्व है | धर्म बाहरी क्रिया –कलाप और अभ्यास है,जीवन धारण करने का ढंग है

जीवन की मूल स्रोत की खोज आध्यात्मिकता है और यह अनुभव करना है की हम उसी दिव्यता के अंश है सत्य ही वास्तविक  आध्यात्मिकता का आधार और साहस उसकी आत्मा |

आध्यात्मिकता तुम्हे बहुत सरल ,स्वाभाविक और बच्चे जैसा बना देती है | आनन्दमय ,सहज ,सरल जीवन जीना ही आध्यात्म है|

एक ही प्राण, एक ही धर्म और एक ही भगवान है | जन्म से नही ,स्वभाव से उत्पन्न ,स्वभाव् से उत्पन्न गुणों द्वारा कर्म बांटे गये | बांटने का पैमाना है गुण और बाँटने वाली वस्तु है कर्म , कर्म बांटे गये न की मनुष्य |

हिन्दू ,मुस्लिम ,ईसाई आदि धर्म नहीं है बल्कि ये अलग –अलग सम्प्रदाय (मत) है  हमने संकीर्णता के कारण संकुचित दल बना डाले | प्राण सभी सम्प्रदायो में है ,किन्तु कोई भी सम्प्रदाय उसमे नहीं है धर्म कोई बाहा अनुष्ठान नही है | जगत में सब कुछ  धर्म से ही उत्पन्न और धर्म में स्थित है इसलिए जो धर्म सभी जीवो और सर्वभूतो में एक है ,वही धर्म है | प्राण ही प्रकृत ईश्वर है , जो हमारे –तुम्हारे एवं सभी के भीतर है प्राण की चंचलता ही काल ,समय या व्यवधानों की सृष्टि करता है | प्रकृत धर्म की उत्पति न होने से इसका विनाश भी नहीं है | स्वभाव में पायी जाने वाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगना स्वधर्म है

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