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गंगा और देव – Ganga Aur Dev 2nd Part Novel in Hindi

सावित्री की सलाह

गोशाला, दिल्ली से छह सौ सत्ताइस किमी दूर उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा जिला। आबादी एक लाख बीस हजार। आबादी हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र। लोगों का मुख्य पेशा कृषि और पशुपालन। ना ही दिल्ली की तरह कोई कम्पनी, ना ही धुऑ छोड़ती कोई फैक्टरी। न ही करोड़ों वाली आबादी की भीड़-भाड़, बसों में दौड़ कर चढ़ने की परम्परा, ना ही मेटों की हर 5-5 मिनट में आवाजाही।

गोशाला में था तो सिर्फ दूर-2 तक क्षितिज में नीला आसमान और नीचे बस खेत ही खेत। गेहूॅ, गन्ना, सरसों की फसलें। 3-3 चीनी की मिलें, जितनी मन आऐ उतनी चीनी खाओं। ताजी-2 सब्जियों की खेती। मीठे-2 आम व आमरूद के सैंकड़ों बगीचे।

गोरा रंग, गोल चेहरा, बड़ी-2 ऑखें, ऑखों पर बड़ी सुन्दर भौंहे की नक्काशी, गुलाबी पतले-2 वाला देव अपने घर गोशाला लौट आया था अपनी जान से प्यारी मॉ सावित्री के पास रहने के लिए दिल्ली से अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद।
देव! बावन साल की सावित्री की एकलौती संतान, इसलिए उसकी जान का टुकड़ा। मैंने महसूस किया

दिल्ली  वाली टेन बस कुछ ही देर में आने वाली है!! मनोहर मामा ने अपनी वाच बैचैनी से देखी। वो देव को लेने के लिए अपनी अमबेसडर कार ले आये थे गोशाला के स्टेशन पर। दूसरी ओर वहीं हवेली पर….

अरे गीता! तूने सब कुछ बना लिया ना! कुछ भूली तो नहीं!…..छोले चावल वो जो देव को पसन्द है देव की मॉ सावित्री जहॉ एक ओर बड़ी खुश थी कि उसका इकलौता बेटा छह सालो बाद आद दिल्ली से अपनी पढ़ाई खत्म कर लौट रहा है…..सावित्री बिल्कुल पागल हुई जा रही थी। इतने सालो से देव से बस फोन पर ही बात होती थी। आज वो दिन था जब सावित्री देव को अपने कलेजे से लगाकर दिल की तसल्ली करेगी। उसे आज मन की शाति मिलेगी। आज चैन मिलेगा उसे। मैंने जाना

हाँ  भाभी! मामी ने जवाब दिया
कढ़ी-चावल, बेसन की दही वाली पकौड़ियॉ और रायता भी बन गया ना
हाँ  भाभी! मामी ने जवाब दिया
आमलेट और पनीर की भुजिया…..वो भी तैयार कर ली ना
हाँ हाँ !….मैंने वो भी तैयार कर ली है भाभी!! मैं कुछ भी नहीं भूली!!मामी  ने फटाक से बड़ी तेजी जवाब दिया

….और वो जो नॉन-वेज खाना जो मैंने कल तुझे रात में बनाने को बताया था सावित्री से कन्रफर्म करते हुए पूछा! हॉ!….मैंने सब कुछ तैयार कर लिया है!! देव की गीता मामी ने एक बार फिर से सिर हिलाया गीता ! दोनो नौकरानियों से बोल दे कि देव कर कमरा अच्छी तरह साफ कर दे। सोफे के सारे कवर , बेड सीट बदल दे, कॉच की सारी खिड़कियों को गीला कपड़ा कर साफ कर दे….और पर्दे लाल रंग के लगा देना! देव को लाल रंग के पर्दे पसन्द है!!

हाँ ! हॉ! भाभी!! ये सारे काम कल रात को ही मैंने करवा दिये है……देव के कमरों को अच्छी तरह सजा दिया है, गुलदस्तो में गुलाबी और पीले रंग के गुलाब के फूल रखवा दिये है!!…तुम अब बिल्कुल भी चिन्ता मत करो!

…..तभी मनोहर मामा देव को ले आयें। कार हवेली के मुख्य द्वार पर लगाई…

मालकिन मालकिन!….देव बाबू आ गये! देव बाबू आ गये!! कश्यप खानदान का पुराना व वफादार नौकर दयाराम दौड़ते-2 सावित्री के पास आया। जैसे आज वो भी बहुत खुश था। फूले नही समा रहा था। मैंने पाया

देव ने पहला कदम जमीन पर रखा….
मॉ कहा है….. देव ने पूछा हमेशा की तरह अपने ओठों पर मुस्कान ओढ़ते हुए। यही शब्द इतने सालो बाद देव के मुॅह से पहली आर निकले।

सावित्री जो देव की आरती उतारने के लिए पूजा की थाली सजा रही थी…वो तो जैसे पगला ही गयी। जब दयारात ने बताया कि देव हवेली पर पहुॅच चुका है।
मॉ….कहॉ हो  देव ने सावित्री को आवाज दी और मामा, मामी व अन्य लोगों के साथ घर में प्रवेश किया।

देव की आवाज सुनते ही सावित्री जैसे बावली हो उठी। उसके दिल की धड़कन तेज हो गयी… दयाराम! अच्छा ये तो बता कि मेरा देव देखने में कैसा लगता है मोटा-वोटा हुआ कि नहीं पहले की तरह सूखा हैक्या उसे दिल्ली का पानी सूट किया  सावित्री ने एक के बाद अनगिनत सवाल दयाराम से पूछे बड़ी बेचैनी और हड़बड़ाहट में। असलियत में वो आज इतनी ज्यादा खुश दी कि अपने आप को संभाल ही नहीं पा रही थी। मैंने नोटिस किया

अरे ! मालकिन! आपको इतना इंतजार करने की कोई जरूरत नही है! देव बाबू आ गये है!….सभी लोग बैठक वाले कमरे में हैं!… आपका इंतजार कर रहे हैं! दयाराम ने बिना देर लगाऐ झट से सावित्री को बताया।

रूक जा! दयाराम! काला टीका तो बना लूॅ….कहीं ऐसा न हो कि देव को देखूॅ तो मेरी नजर ही लग जाऐ!! सावित्री बड़ी जल्दबाजी से काला टीका बनाने लगी।
अब वो अपने पहली मन्जिल वाले कमरे से निकली और गोल-2 घूमती हुई सीढ़ियों से एक हाथ से अपनी साड़ी और दूसरे हाथ में आरती वाली थाली को लेकर धीरे-2 नीचे हाल की तरफ उतरने लगी जहॉ पूरा परिवार पहले से ही जमा था।

सावित्री एक पल में नीचे उतरकर देव को सीने से लगा लेना चाहती थी…पर बहुत अधिक उत्सुकता ने मन में घबराहट हो जन्म दे दिया था। इसलिए सावित्री ज्यो-2 नीचे पैर रखती जाती थी, उसकी घबराहट भी बढ़ रही थी। घबराहट मतलब देव से मिलने की खुशी।
माँ  , देव सावित्री की मुड़ा। उसन सावित्री को पुकारा। सीढ़ियों पर से ही उसने अपनी मॉ के आने की आहट सुन ली। सावित्री की भारी भरकम साड़ी जिसमें हजार तरह की लटकन और घुॅघरू लगे थे।

टेलीफोन   में तो तुम कहती थी कि सबसे पहले तुम मुझे देखोगी!….सबसे पहले मेरी आरती उतारोगी!….और अब देखों जब पूरा परिवार मुझसे मिल चुका तब तुम…..सबसे बाद में मुझसे मिलने आ रही हो!!!!……जाओ! तुम मुझे जरा भी प्यार नहीं करती!! देव ने मुॅह बना लिया और सावित्री से विपरीत दिशा में घूम गया।
पर सच्चाई यह थी कि ये देव का एक स्टाइल था अपनी जान से प्यारी मॉ से बात करने का। देव हमेशा से ही जानता था कि सावित्री उसे बहुत चाहती है।

देव ! देर इसलिए लगी कि मैं तेरे लिए काला टीका बना रही थी……..यह  कहते हुए सावित्री ने देव को उसके मत्थे के बाई ओर एक टीका लगाया , वरना घर में किसी की हिम्मत नहीं कि मुझसे पहले तुझे कोई देखे! सावित्री बोली
सावित्री ने तुरन्त ही देव को गले से लगा लिया। क्यांकि आज छह सालो बाद वो उसे देख पा रही थी। उसने देव को मत्थे, गाल, व हाथों में जगह-2 से बार-बार चूमा जैसा गाय अपने बछड़े को चूमती है, चाटती है…जब वह शाम को घास के मैदान से घास चरने के बाद लौट आता है। सावित्री भावुक हो उठी थी। मॉ का प्यार पैदा हो गया था। इसमे प्रेम और करूण रस दोनों का मिश्रण था।

अच्छा अच्छा! मैंने मान लिया कि तुम मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती हो  देव ने जवाब दिया
दयाराम देव के बैग, सूटकेस व पहिये की बड़ी सी घिररी वाली टॉली आदि सामान लेकर देव के कमरे में रख आया। घर के सभी लोगों के लिए कुछ न गिफत था। सावित्री के लिए एक लाल रंग की उॅनी शाल, गीता भाभी के लिए एक सिल्क पिकॉक कलर की नीले रंग की साड़ी। मामी के तीनों बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के खिलौने। घर के दोनो नौकरो-दयाराम और सीताराम व उनके परिवार के लिए भी कुछ न कुछ। सभी के सभी के गिफट दे दिये गये। मैंने जाना।

अगला दिन। सुबह का समय। आठ बजे।

दिल्ली से गोशाला की पूरे पन्द्रह घन्टे की यात्रा करने के बाद देव बहुत थका हुआ था। रात में उसे ठीक से नीदं आयी थी। अब वह अच्छा महसूस कर रहा था। मैंने नोटिस किया।

पूरा परिवार महरून रंग की दस फुट लम्बी टेबल पर एकत्र हुआ।
देव!….. बेटा! तू दिल्ली में क्यों रहता है वहॉ पे रहने की जरूरत ही क्या है यहॉ गोशाला में हमारी इतनी रियासत है कि तेरी सात पुश्ते भी बैठ कर खाऐंगी….तो भी कम न पड़ेगा!!….फिर दिल्ली में रहने की क्या जरूरत है सावित्री ने सेब, अमरूद, केले व अन्य फल काटकर उस पर चाट मसाला छिड़क पर देव को दिया।
देव ने लकड़ी वाली नुकीली सींक से कुछ फल खाये।

मॉ!….तुम तो जानती हो कि दिल्ली देश की राजधानी है…..मैं वहॉ पर रहना चाहता हूॅ! देश-दुनिया देखना चाहता हूॅ….वहॉ कि संस्कृति समझना चाहता हूॅ…फिर वहॉ पर एक से बड़ कर एक लाइबेरी है जहॉ पर मुझे तरह-2 की बढ़ियॉ किताबे पढ़ने को मिल जाती है!! देव ने जवाब दिया

तभी गीता मामी आई….
देव!!…..तुम्हें नाश्ते में मैगी चाहिए या आलू के पराठे ए मामी ने पूछा
ण्ण्आलू के पराठे! देव ने जवाब दिया

बेटा! पढ़ाई लिखाई तो ठीक है…..पर तू कभी मेरे बारे में भी सोचता है. ….मेरे बुढ़ापे की तो तुझे बिल्कुल भी फिक्र नहीं है! सावित्री ने मुॅह बनाते हुए कहा
मॉ! तुम चाहती क्या हो साफ-2 बताओ! देव ने पूछा
बेटा!……देख तू जो एमबीए की पढ़ाई करना चाहता था अब वो भी पूरी हो चुकी है!…….मैं चाहता हूॅ एक अच्छी सी लड़की देख कर तेरी शादी कर दूॅ!…..और तू यहीं मेरे पास गोशाला में ही रहे!….मैं मरने से पहले अपने पोते-पोती के साथ खेलना चाहती हूॅ! सावित्री ने इक्छा व्यक्त की।

नहीं! नहीं! मॉ…..अब तो मैं अभी खुद एक बच्चा हूॅ!……अगर मैं शादी कर लूॅगा…तो मेरी पढ़ाई लिखाई छूट जाऐगी!…फिर मैं कोई भी किताब न पढ़ पाउॅगा…..और फिर अब मुझे दिल्ली में इतनी अच्छी नौकरी भी तो मिल गयी है!!….सब कुछ कितना बढ़िया चल रहा है!! देव एक तरफ आलू के पराठे खाता गया और बोलता गया

हूॅ! सावित्री ने सुना। उसे देव का ये जवाब बिल्कुल भी पसन्द नहीं आया। सावित्री ने नाक-भौ सिकोड़ ली। मैंने देखा

— व —

रात्रि का समय। अब हवेली के चारों ओर अॅधेरा हो चुका था। सभी लोग घर में एकत्र हो चुके थे। दयाराम व सीताराम की बीबियों ने शाम का खाना गीता मामी के देख-रेख में बनाया था।
सावित्री ने दोपहर देव के डैडी को कानपुर टेलीफोन किया था। कुछ जरूरी बात की थी। अब सारा परिवार खाने वाली मेज पर एक बार फिर से एकत्र हो गया था…

गीता! नौकरानियों ने बोल दो कि खाना ले आये!…..सभी बहुत भूखे हैं! सावित्री ने गीता मामी से कहा। गीता मामी रसोईघर की ओर दौड़ गयी। देव मामी के तीन बच्चों के साथ खेलता हुआ डाइनिंग टेबल की ओर आया। देव ने पिन्की ; मामी की बेटीद्ध को गोद में उठा रखा था। देव ने एक नीली सफेद छोटे चेक वाली कॉटन हाफ फिटिंग शर्ट ओर एक नीली जींस पहन रखी थी। वह गजब का स्मार्ट लग रहा था।

मेरा बेटा इतनी जल्दी बड़ा कैसे हो गया कल तो ये कितना छोटा था यही घुॅटनों के बल दौड़ता था…..और अब देखों ये आज कैसे एक आदमी जितना बड़ा हो गया है जहॉ देव पिंकी के साथ खेल रहा था वहीं सावित्री ऑखे गड़ाकर ये सारी बाते मन ही मन सोच रही थी। उसे वही आनन्द प्राप्त हो रहा था जो लोगों को अपनी जवान संतानों को देखकर प्राप्त होता है। मैंने गौर किया

देव ने सावित्री के सामने दो कुर्सियॉ पीछे की ओर खींची। एक पर पिंकी को बैठाया और दूसरे पर खुद बैठा। अब तक विभिन्न प्रकार का बना हुआ खाना टेबल पर आ चुका था। कई साल बाद देव के घर लौटने की खुशी में आज घर में नॉन वेज खाना बना था। मटन गाढ़ा, मसालेदार व बहुत ही लजीज था जो विभिन्न प्रकार के मसालों से बनाया गया था। वही मुर्गे को तन्दूर में लोहे ही पतली छड़ों में पिरोकर भूना गया था। गीता मामी ने कीमा और चने की दाल मिलाकर कराब रोल भी बनाया था। सारी डिशेश देव की मनपसन्द डिशेश थी। सभी लोगों ने खाना खाया।

बस! बहुत खा लिया मामी! अब नहीं देव ने बहुत मना किया और अपनी प्लेट लेकर दौड़ा पर गीता मामी ने एक नहीं सुनी और जबरदस्ती स्पाइसी फ्राइड मछली के कुछ पीस देव की प्लेट में रख दिये।
मामी! आई लव यू! देव बोला मस्ती से झूमकर
सच में खाना बहुत टेस्टी है!! देव ने भी तारीफ की। मामी से मुस्कराकर सिर हिलाया
अब सभी खाना खा चुके थे। अब सभी उठने वाले थे।

देव!……..सावित्री ने देव को बड़े प्यार से पुकारा धीमी आवाज में
मैंने आज तुम्हारे डैडी को कानपुर टेलीफोन किया था…….वो कह रहे थे कि अगर तू बीएड वाला कोर्स करजे तो तुझे….मासरी वाली नौकरी मिल जाऐगी। तब तुझे अपनी किताबे पढ़ने का भी समय मिल जाऐगा!!……और बेटा सबसे अच्छी बात है कि तुझे नौकरी यही गोशाला में ही मिल जाऐगी!!…..तब मैं तेरे पास रहने का सुख पा सकूॅगी!! सावित्री ने बड़ी प्यार से देव से कहा उसे पटाते हुए।

बेटा! शादी-वादी मत कर!….पर कम से कम ये कोर्स तो कर ले!! फिर सावित्री बोली
देव ने सुना।
बता देव ये कोर्स करेगा सावित्री ने पूछा उसे मक्खन लगाते हुए
देव ने सुना। वो सोचने लगा कि क्या करूॅ।
अच्छा ठीक है! तुम कह रही हो तो सिर्फ इसलिए देव ने सिर हिलाया
…..वरना और कोई कहता तो कभी नहीं करता! देव ने साफ किया।

— व —

कुछ ही दिनों में बीएड का फार्म निकला।
देव ने फार्म भरा। बाराबंकी जाकर इन्ट्रैंस इक्जाम दिया।

दो महीने बाद

Read — 3 rd Part of Novel 

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