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खून के निशान- कविता

बड़े मशहूर इस शहर के

सुंदर कोने में एक मकान है |

मकान की बगल की रेट पर

कुछ लहू के निशान है |

वो चंद बुँदे खून की

जमीन में समाना चाहती है

पर कमबख्त हवा है बैरी

उन्हें अपने साथ बहा ले जाती है

इस कश्मकश , इस द्वन्द में

ये बेचारी बुँदे पिस जाती है

उनसे पूछो तो कहेगी

हम फिर से उन गलियों में दौड़ना

चाहती है |

चंद लम्हों के फेर ने

उनका वजूद उनसे छीन लिया ,

उस शहर के सब अखबारों में

अब एक क्या और तीन क्या |

वो बुँदे अब ताजा न रही

अब आधा खुद को पाती है

आँखे उनकी है नही

पर रुआंसी जरुर हो जाती है|

इस शहर से अब डर लगता है

ये शहर बहुत सुनसान है

पर अब भी इस शहर के

उस सुदूर कोने में वो मकान है |

आस-पास लोगो से पूछा

तो बोले की रहते इसमें कुछ इन्सान है

पर उस नासमझो को क्या पता

वहाँ अब बस खून के निशान है |

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