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क्रांतिकारी – श्री अरविंद घोष जीवन परिचय

   श्री अरविंद घोष जीवन परिचय

         — Aurobindo Ghosh Biography in Hindi–

राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक और भारतीय दर्शन के पोषक के रूप में महर्षि श्री अरविन्द एक विराट विश्वविभूति व् सत्यान्वेषी थे |

श्री अरविन्द घोष पर निबंध

जन्म   –  १५ अगस्त १८७२ को , बंगाल के अभिजात्य कूल में उनका जन्म हुआ था | माता स्वर्णलता देवी एवं श्री कृष्ण धन घोष की तीसरी संतान थे – श्री अरविन्द ! उनके ७५ वे जन्मदिवस के दिन ही भारत आजाद हुआ | यह एक संयोग नही पूर्व निर्धारित भागवत विधान था | उन्होंने भारतमाता को केवल पहाड़ो ,नदियों और जंगलो तक एक जमीन के टुकड़े के रूप में नहीं देखा वरन वे भारत माँ को एक सजीव माँ के रूप में देखते थे|

शिक्षा – श्री अरविन्द की शिक्षा – दीक्षा इंग्लेंड में हुई क्योंकि उनके पिता पाश्चात्य सभ्यता के प्रेमी थे | ७ से २१ वर्ष की आयु तक इंग्लैंड में रहकर उन्होंने विभिन्न क्षेत्रो में उच्च शिक्षा प्राप्त की | फ्रेंच , इटालियन ,लेटिन आदि भाषाओ का ज्ञान था |

भारत आए –

सन १८८३ में श्री अरविन्द भारत आए और बडौदा राज्य में महाराजा के सलाहकार बने और विश्विद्यालय का कार्यभार भी सँभालने लगे | १३ वर्ष तक यहाँ काम करने के बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और ‘ वंदेमातरम् ‘ और युगांतर नामक समाचार पत्रों का सम्पादन और निर्देशन करने लगे | श्री अरविन्द ने इसे राष्वादी दल का मुखपत्र घोषित किया और पहली बार इस पत्र द्वरा पूर्ण स्वराज्य की मांग रखी | तिलक और सिस्टर निवेदिता का सहयोग लेने लगे और सुरेंद्नाथ बनर्जी , विपिनचंद्र पाल ,गणेश देउस्कर .सुखाराम. सरला देवी और वारींद्र घोष आदि नवयुवजनो की सेना तेयार की |

जेल जाना पड़ा  –

सक्रीय राजनीति में भाग लेने के कारण १९०८ में उन पर अलीगढ़ बमकांड में शामिल होने के संदेह में उन्हें जेल जाना पड़ा | बाद में प्रमुख बेरिस्टर चितरंजन दास ने उनका मुकदमा लड़ा और श्री अरविन्द को जेल से रिहा कर दिए गए | जेल उनके लिए तपस्थली बन गई थी ,यहाँ वे दिन रात भगवान के ध्यान में लीन रहते थे | जेल में ही उन्हें वासुदेव श्री कृष्ण के दर्शन हुए और उनकी चेतना में वासुदेव बस गए | जेल में रहते हुए श्री अरविन्द ने वेदों ,उपनिषदों और गीता का गहन अध्ययन किया | जेल में उन्हें अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई |

श्री अरविन्द के विचार –

उनका सोचना था की , आत्म त्याग आध्यात्मिक मुक्ति के लिए नहीं , बल्कि देश के भाग्य निर्माण के लिए भी जरुरी है | वे अब दूर की सोचने लगे ,उनका कहना था की नव जागरण केवल बोध्दिक क्षमता बढ़ाने से , मशीने बनाने से ,नई वैज्ञानिक पध्दतिया निकालने से नहीं आता , वह आता है – नया ह्रदय पाने से ,नई आत्मा पाने से | उन्होंने कहा – जीवन को पुनजीवित करो | जब तुम अजेय निर्भय हो जाओगे , तब आजादी मिलेगी ,केवल स्वराज्य की बात करने से स्वराज्य नहीं आता | पहले आत्मराज्य ,फिर स्वराज्य |

उनके लिखे हुए ग्रन्थ –

एकांतवास में उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रो का अध्ययन किया और जीवन के परम सत्य की खोज निकाला तथा इसके निष्कर्ष रूप में उन्होंने अनेक ग्रन्थ की रचना की _- दिव्यजीवन ,मानवचक्र, वेद रहस्य , योग समन्वय तथा सावित्री आदि | इसमें सावित्री उनका अनुपम ग्रन्थ है जिस पर उन्हें नोबेल पुरुस्कार भी दिया गया परन्तु श्री माँ ( उनकी शिष्या ) ने इसका मूल्यांकन करने से इंकार कर दिया |

श्री अरविन्द का दर्शन –

श्री अरविन्द धरती पर स्वर्ग लाना चाहते थे साधना दवारा परमात्मा को प्राप्त करना , फिर लोक सेवा के लिए धरती पर कार्य करना और सम्पूर्ण विश्व को ऊपर उठाना , यही है श्री अरविन्द का दर्शन |

आजतक आध्यात्मिक जगत में यह होता आया है की साधना करो , योग करो और स्वर्ग चले जाओ |श्री अरविन्द कहते है –अपनी साधना द्वरा उस दिव्यलोक को ही धरती पर उतार लाओ | दिव्य चेतना को ही जीवन में ले आओ और इसके लिए ग्रहस्थ जीवन को त्यागने की कोई आवश्कता नहीं है | दैनिक जीवन ही योग बन जाए | समस्त मानव जाति का दिव्यकरण चाहते थे और इसलिए उन्होंने ‘अतिमानव ’ का मनुष्य का विकसित , देवत्व में रूपांतरित स्वरूप का प्रतिपादन किया ’ उनके अनुसार जीवन के स्तरों का अवरोहन करते हुए उच्चतर से उच्चतर चेतना में आरूढ़ होना | यही है अरविन्द का पूर्ण योग |

देहांत –

५ दिसम्बर , १९५० को श्री अरविन्द का देहावसान हो गया था |

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