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कुंभकार A Poem on Kumbhkar in Hindi

कुंभकार

      माटी से बना इंसान,

      एक दिन माटी में ही है मिल जाना,

      फिर भी पत्थर दिल बना जमाना,

      क्यों भूला है वो खेल पुराना,

      जिस माटी की सोंधी सी खुश्बू से

       महक उठता था दिलों का आशियाना,

      आज जाति धर्म में बंटकर रह गया है

       सफर वो सुहाना,

      मगर कुंभकार न भूले

      सोंधी सी मिट्टी की इस खुश्बू के जैसे

      अपने वजूद को महकाना

      और आपस में प्यार बढ़ाना।

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