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एक पल भी जिन्दगी का व्यर्थ क्यों जाये? हिंदी कविता

एक पल भी जिन्दगी का व्यर्थ क्यों जाये?

सुन सको तो फिर सुनो संवेदना मेरी ,

कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?

आदमी हो ,आदमी का अर्थ तो जानो ,

जिन्दगी का लक्ष्य क्या स्वयंमेव पहचानो

जब सुगंधित जो करे उसको सुमन कहते है

जलपान तक सीमा रही चौपाय की |

कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?

आग –सी जो धुल ऊपर पैर चलता है ,

बुद्धि से अवरोध दलकर जो सँवरता है ,

वह सहज ही खोजता है मार्ग जीवन का

जिसको रही सुधि स्वत्व की अभिप्राय की |

कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?

जो किसी से दान में उत्थान पाता है ,

व्यक्ति वो हाँ में उसी की हाँ मिलाता है ,

बुदबुदाये यों लगे ज्यों खोलने से भी

खुलती न खिड़की ज्ञान की संकाय की |

कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?

एक पल भी जिन्दगी का व्यर्थ क्यों जाये ?

जो किए सत्कर्म वे ही मंजिल पाये ,

विश्व उनको याद करता है सदा जग में

जो अनय –भय के दमन को सामने आये |

किसको पता है क्या अवधि है साय की ?

कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?

 

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