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उम्मीदों की कोंपल (कविता)

उम्मीदों की कोंपल

मन की पीड़ा ,

क्यों थाम लेती है

अश्को को दामन

अंखियो से लगती है

झड़ी जैसे सावन की |

रिश्तो की बगिया में

आ गया मौसम

क्यों पतझड़ का ,

रूठे हुए प्यार का |

अलगाव की आँधी

खोखला कर रही है

आपसी रिश्तो की जड़ो को

छोटो को , बड़ो को |

झरने दो स्वार्थ के पते

टूटने दो मधुमखियो के छते

अपने ही आँगन में |

लहू बना नहीं

अब तक पानी

एक जुडाव

अब भी बाकी

शेष है कहानी |

बस अपने ह्रदय में

प्रेम की उम्मीदों की कोंपल

फूटने दो |

पतझड़ पीछे छुट गया है ,

छुटने दो |

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