अनजान सफर…Inspirational Hindi Poem

By | June 30, 2018
अनजान सफ़र

चले जाता हूँ सुने सड़कों पर

सैंकड़ो की भीड़ में यूँ अकेला

अनजान राहों की मस्तियों में

एक अनजान सफ़र की ओर अकेला

पत्थरों की ठोकर ने, घर की याद यूँ दिलाई

पीछे मुड़कर देखा तो मैंने बहुत

पर घर की राह, अब थोड़ी भी नजर न आई

बदगुमानी के उस आलम को छोड़ निकला था मैं

जहाँ लोगो का मान,कौड़ियों में बिकता है

सोचा था न लौटूंगा कभी

सोचा था न लौटूंगा कभी

जहाँ इंसान,इंसानों में ही बिकता है |

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